श्री भिक्षु की जय जयकार जन जन पर भारी उपकार (Shri Bhikshu Ki Jai Jaikaar Jan Jan Par Bhari Upkar)

यह भजन आचार्य श्री भिक्षु स्वामी की महिमा और उनके महान उपकारों का स्मरण कराता है। इसमें उनके द्वारा स्थापित तेरापंथ धर्मसंघ, अनुशासन, त्याग और आदर्श जीवन का वर्णन किया गया है। सरल और भक्तिभाव से भरे शब्दों में यह रचना बताती है कि आचार्य श्री भिक्षु ने समाज और धर्म के उत्थान के लिए कितने महान कार्य किए।

 

श्री भिक्षु की जय जयकार जन जन पर भारी उपकार

🎶 लय – रघुपति राघव राजा राम

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमती जी 

 

श्री भिक्षु की जय-जयकार, 

जन-जन पर भारी उपकार। 

तेरांपथ सबका आधार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

मंगलमय पावन अभिधान, 

मंगलमय शासन सुविधान। 

मंगल तेरस का त्यौंहार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

संघ शरण में जो आया, 

उसने अनुशासन पाया। 

जुड़ जाते अन्तर के तार, 

श्री भिक्षु की जय-जयकार।।

 

दीपां मां के पूत-सपूत, 

हाथ-पांव से थे मजबूत। 

सिंह स्वप्न होता साकार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

निर्मल बुद्धि चातुर्य महान, 

महाजन विद्या का सुविधान। 

बचपन में ऊँचे संस्कार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

शिथिल संघ को छोड़ दिया, 

गुरु से नाता तोड़ लिया। 

उज्ज्वल हो गण का आचार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

लाखों का कल्याण किया, 

भारीमाल को स्थान दिया। 

शिष्य खेतसी थे सुखकार, 

श्री भिक्षु की जय जयकार।।

 

यह भजन आचार्य श्री भिक्षु के महान व्यक्तित्व, त्याग और अनुशासन की प्रेरणा देता है। उनके आदर्श आज भी धर्मसंघ और समाज को सही मार्ग दिखाते हैं और सभी के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏