यह भजन आचार्य श्री भिक्षु स्वामी के प्रति गहन श्रद्धा, भक्ति और त्याग की भावना को सरल शब्दों में प्रकट करता है। पणिहारी की लोकलय पर रचित यह गीत स्वामीजी के कठोर तप, अडिग संकल्प और सहनशीलता को स्मरण कराता है। अंधकार में ज्ञान का दीप जलाने वाले, अपमान और कष्ट को हँसकर सहने वाले स्वामीजी का जीवन धर्म-प्रचार, साधना और बलिदान का प्रेरक आदर्श प्रस्तुत करता है।
सांवरिया स्वामीजी! आवो आंगणै हो
🎶 लय – पणिहारी
सांवरिया स्वामीजी! आवो आंगणै हो,
ध्याऊं थांरो एक ध्यान।
अन्तर मन रा भगवान,
देव! उतारूं थांरी आरती, भिक्खू स्याम।।
सुधरी री छतरयां गावै प्रीत स्यूं हो,
थांरी वीरता रा गीत।
दृढ़ संकल्प रा संगीत,
पहलो प्रवास समसाण हो, भिक्खू स्याम।।
अंधेरी ओरी में हुयो च्यानणो हो,
चसग्या ज्ञान रा दीया।
हरषित जन-जन रा हिया,
आगे बढ़ायो अभियान हो, भिक्खू स्याम।।
भोगी ही कठिनायां स्वामी आकरी,
हो पूरो मिलतो नहीं आ’र।
तपती सरिता चर में जा’र,
चाख्या तपस्या रा पकवान हो, भिक्खू स्याम।।
छाती में मुक्का ठोला शीश में,
हो तीखी गाल्यां रा बै तीर।
सहया हंस-हंसकर बो वीर,
शंकर बण्यो हो कर विषपान हो, भिक्खू स्याम।।
चमक्यो है थांरी साची साधना स्यूं,
सूरज सो ओ तेरापंथ।
आलोकित नभ धरा दिगन्त,
अमर बण्यो है बलिदान हो, भिक्खू स्याम।।
संकट टळै है फळै कामना,
हो मंत्राक्षर-सो थांरो नाम।
सरज्या मनवांछित सै काम,
पाया तुलसी सा पुण्य निधान हो, भिक्खू स्याम।।
यह भजन हमें आचार्य श्री भिक्षु स्वामी के त्याग, तपस्या और साहस से प्रेरणा लेकर सत्य, संयम और धर्म के मार्ग पर दृढ़ता से चलने का संदेश देता है। उनकी साधना और बलिदान सदैव हमारे जीवन को प्रकाश देने वाले हैं।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
