यह सुप्रसिद्ध जैन भजन आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित है। इसमें बहुत ही सुंदर और सरल भाषा में जैन धर्म के पावन प्रतीकों की वंदना की गई है। इस रचना में 24 तीर्थंकरों, अनंत सिद्धों, गणधरों और पंचपरमेष्ठी के प्रति गहरी भक्ति व्यक्त की गई है। साथ ही, इसमें तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक स्वामी भिक्षु से लेकर नौवें अधिशास्ता आचार्य तुलसी तक की गुरु-परंपरा का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया है। यह भजन मन को निर्मल करने और आत्मिक शांति पाने का एक सशक्त माध्यम है।
प्रहसम परम पुरुष ने समरूं
🎶 लय – सुगुणा! पाप पंक परिहरिये
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
प्रहसम परम पुरुष ने समरूं,
परम पुरुष नै सुध मन समर्यां,
आतम निरमल होय।
निज में निज-गुण परगट जोय।।
ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन,
सुमति, पद्मप्रभ नाम।
सप्तम स्वाम सुपास, चन्दाप्रभु, सुविधि,
शीतल अभिराम।।
श्रेयांस, वासुपूज्य जिन वन्दूं,
विमल अनन्त विशेष।
धर्म, शान्ति, कुन्थू, अर, मल्ली,
मुनिसुव्रत तीर्थेश।।
नमि जिन, नेमिनाथ पारसप्रभु,
चौबीसमां महावीर।
भाव निक्षेपे भजन करंतां,
पावै भवदधि तीर।।
सिद्ध अनन्त अष्ट गुण-नायक,
अजरामर कहिवाय।
तीन प्रदक्षिणा देई प्रणमूं,
थिर कर मन-वच-काय।।
गौतम आदि इग्यारह गणधर,
धर्माचारज ध्येय।
पंचवीस गुण युक्त विराजै,
उपाध्याय आदेय।।
अढ़ी द्वीप पनरा खेत्रां में,
पंच महाव्रत धार।
समिति-गुप्ति-युत जो सुध साधू,
वन्दूं बारम्बार।।
दु:षम आरे भरत मझारे,
प्रगट्या भिक्षु स्वाम।
अरहंत-देव ज्यूं धर्म दिपायो,
पायो जग में नाम।।
पटधर भारमल्ल ऋषिराया,
जयजश मघ महाराज।
माणकलाल डालगणि कालू,
अष्टम पट अधिराज।।
भाग्य योग भिक्षु-गण पायो,
तेरापंथ प्रख्यात।
परम प्रमोद मनावै गणपति
‘तुलसी’ वंदना-जात।।
यह भजन हमें अपनी जड़ों और गुरु-परंपरा से जोड़ता है। श्रद्धा और लय के साथ इसका गान करने से न केवल चित्त प्रसन्न होता है, बल्कि आत्मिक गुणों का भी विकास होता है। यह भक्ति और समर्पण का एक अनूठा संगम है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
