यह भक्तिपूर्ण रचना आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित है, जो जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को दर्शाती है। इस स्तुति में कवि प्रभु के ‘वीतराग’ स्वरूप की महिमा गाते हैं और स्वयं भी उनके जैसा बनने की मंगल भावना व्यक्त करते हैं। सरल शब्दों और भावुक पंक्तियों के माध्यम से यह कविता भक्त के हृदय में बसी ईश्वर की अनन्यता को प्रकट करती है। यह न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि आत्म-कल्याण की राह पर चलने का एक पावन संकल्प भी है।
प्रभु पार्श्व देव चरणों में
🎶 लय – लो जैन जगत के तीर्थंकर
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
प्रभु पार्श्व देव चरणों में,
शत-शत प्रणाम हो।
मेरे मानस के स्वामी!
तुम एक धाम हो।।
दुनिया में देव लाखों,
हैं पूजे जा रहे।
जिनदेव! इस रसना में,
तेरा ही नाम हो।।
तुमसे न राग रत्ती,
क्यों द्वेष और से?
यह वीतरागता तेरी,
मेरा विश्राम हो।।
उऋण बनू मैं कैसे,
उपकार से अहो!
चरणों में भले पन्हैया,
यह मेरी चाम हो।।
पा एक बार पारस,
हतभाग्य जो रहा।
पारस अब स्वयं बनू मैं,
बस वैसा काम हो।।
नस-नस में बस रहे हो,
रस ज्यों कवित्व में।
भगवान! भक्त ‘तुलसी’
के तुम ही राम हो।।
यह रचना भक्त और भगवान के अटूट संबंध का सुंदर प्रमाण है। आचार्य तुलसी की यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि सच्ची भक्ति केवल माँगने में नहीं, बल्कि प्रभु के गुणों को स्वयं में ढालकर ‘स्वयं पारस’ बनने में है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
