यह सुप्रसिद्ध जैन संत आचार्य तुलसी द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण और विनम्र प्रार्थना है। इस भक्ति रचना में भक्त अपने आराध्य (प्रभु) को अपने मन रूपी मंदिर में पधारने का आमंत्रण दे रहा है। कवि स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर को बाहरी आडंबरों, धूप-दीप या जड़ पूजा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पूरी सृष्टि उन्हीं की है। वे अपने ‘चंचल और मलिन’ मन को स्वीकारते हुए प्रभु से करुणा की दृष्टि मांगते हैं। यह कविता समता, सादगी और आत्म-समर्पण का सुंदर संदेश देती है।
प्रभु! म्हारै मन-मंदिर में पधारो
🎶 लय – आसावरी
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
प्रभु! म्हारै मन-मंदिर में पधारो,
म्हारो स्वागत नाथ! सिकारो,
करूँ पूजन प्राण-पिया रो,
प्रभु! म्हारै मन-मंदिर में पधारो।।
चिन्मय नै पाषाण बणाऊं,
जो परिचय जड़ता रो।
स्वयं अमल अविकार प्रभु तो,
स्नान कराऊं क्यांरो?
फल फूलां री भेंट करूँ के?
जीवन अर्पण म्हारो।
अगर तगर, चन्दन के चरचूं?
कण-कण सुरभित थांरो।
नहीं ताल कंसाल बजाऊं,
धूप न दीप उजारो।
केवल लयमय स्तवना गाऊं,
ध्याऊं ध्यान गुणां रो।।
मन चंचल है और मलिन है,
ओ है धीठ धुतारो।
सब कुछ है तब ही तो तेडूं,
सकरुण दृष्टी निहारो।।
वीतराग हो, समदर्शी हो,
समता-रस संचारो।
‘तुलसी’ तारण-तरण तीर्थपति,
अपणो विरुद विचारो।।
निष्कर्षतः, यह रचना बाहरी कर्मकांडों के बजाय अंतर्मन की शुद्धि पर बल देती है। कवि का विनम्र निवेदन है कि प्रभु अपनी दयालुता (विरुद) का स्मरण कर भक्त के हृदय में समता का भाव भर दें, ताकि जीवन तर सके।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
