परमेष्ठी वंदना एक भावपूर्ण स्तुति है, जिसमें जैन धर्म के पाँच परमेष्ठियों – अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु के गुणों का श्रद्धा से स्मरण किया गया है। रचना में विनय, वैराग्य, ज्ञान और आत्मशुद्धि का सुंदर समन्वय है। यह वंदना साधक को अहंकार से मुक्त होकर धर्ममार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और अंतर्मुखी साधना का भाव जाग्रत करती है।
परमेष्ठी वंदना - वंदना आनंद पुलकित
🎶 लय – लें नये निर्माण का व्रत
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
वन्दना आनन्द-पुलकित,
विनय-नत हो मैं करूं,
एक लय हो, एक रस हो,
भाव-तन्मयता वरूं।
सहज निज आलोक से,
भासित स्वयं संबुद्ध हैं,
धर्म-तीर्थंकर शुभंकर,
वीतराग विशुद्ध हैं।
गति-प्रतिष्ठा त्राण-दाता,
आवरण से मुक्त हैं,
देव अर्हत् दिव्य-योगज,
अतिशयों से युक्त हैं।
बंधनों की श्रृंखला से,
मुक्त शक्ति-स्रोत हैं,
सहज निर्मल आत्मलय में,
सतत ओत:प्रोत हैं।
दग्धकर भव बीज अंकुर,
अरुज अज अविकार हैं,
सिद्ध परमात्मा परम,
ईश्वर अपुनरवतार हैं।
अमलतम आचारधारा,
में स्वयं निष्णात हैं,
दीप-सम शत दीप दीपन,
के लिए प्रख्यात हैं।
धर्म-शासन के धुरन्धर,
धीर धर्माचार्य हैं,
प्रथम पद के प्रवर प्रतिनिधि,
प्रगति में अनिवार्य हैं।
द्वादशांगी के प्रवक्ता,
ज्ञान-गरिमा-पुंज हैं,
साधना के शान्त उपवन,
में सुरम्य निकुंज हैं।
सूत्र के स्वाध्याय में,
संलग्न रहते हैं सदा,
उपाध्याय महान श्रुतधर,
धर्म-शासन सम्पदा।
सदा लाभ-अलाभ में,
सुख-दु:ख में मध्यस्थ हैं,
शान्तिमय, वैराग्यमय,
आनन्दमय आत्मस्थ हैं।
वासना से विरत आकृति,
सहज परम प्रसन्न हैं,
साधना धन साधु,
अन्तर्भाव में आसन्न हैं।
यह वंदना हमें परमेष्ठियों के आदर्श गुणों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती है। श्रद्धा, संयम और आत्मचिंतन के साथ की गई यह स्तुति साधक के भीतर शांति, वैराग्य और आत्मकल्याण की भावना को सुदृढ़ करती है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
