यह सुंदर भजन “पंखीड़ा ओ पंखीड़ा” श्री अरविन्द जी नाहर द्वारा रचित है। इसमें भक्त अपने भावों को एक पंखी (पक्षी) के माध्यम से प्रकट करता है। वह पंखी से प्रार्थना करता है कि वह सिरियारी जाकर भिक्षु बाबा को उसकी वन्दना पहुँचा दे। भजन में गुरु के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण की भावना बहुत सरल शब्दों में व्यक्त हुई है। यह रचना मन में भक्ति, प्रेम और शांति का सुंदर संदेश देती है।
पंखीड़ा ओ पंखीड़ा - भिक्षु बाबा नै म्हांरी वन्दना कहीजै रै
🎶 लय – पंखीड़ा ओ पंखीड़ा (अनुराधा पौड़वाल)
✍🏻 रचयिता – श्री अरविन्द जी नाहर
पंखीड़ा ओ पंखीड़ा, पंखीड़ा ओ पंखीड़ा,
पंखीड़ा तूं उड़ी नै ज्याजै सिरियारी रै।
भिक्षु बाबा नै म्हांरी वन्दना कहीजै रै,
बाबा भिक्षु नै म्हांरी वन्दना कहीजै रै।।
आयो दूर स्यूं, आयो दूर स्यूं,
आयो दूर स्यूं आयो म्हांरी बात कैवण ने,
प्रभु! तूं ही आधार म्हांरी नाव खैवण ने,
प्राण तूं ही, त्राण तूं ही, कहतो रहिज्यै रै।।
जन्म-जन्म स्यूं, जन्म-जन्म स्यूं,
जन्म-जन्म स्यूं प्रभु, थांरो म्हांरो साथ है,
आगै थांरै ही साथ रह स्यूं, साची बात है,
गीत तूं, संगीत तूं ही, बहतो रहिज्यै रै।।
शुभ-कामना, शुभ-कामना,
शुभ कामना सोलह आनै फळगी आज रै,
सारे देश नै ही थां पर तो पूरो नाज रै,
भक्त म्है, भगवान तूं ही रहतो रहिज्यै रै।।
सोतां जागतां, सोता जागतां,
सोतां जागतां, हिवड़ै में थांरो नाम रै,
गुरु दृष्टि स्यूं सुधरै है सारा काम रै,
तन में तूं ही, मन में तूं ही, दूर न रहिज्यै रै।।
यह भजन गुरु भक्ति और अटूट विश्वास का मधुर उदाहरण है। इसमें भक्त का सरल हृदय बोलता है। जो भी इसे श्रद्धा से गाता है, उसके मन में प्रेम, शांति और गुरु के प्रति गहरा समर्पण जागृत होता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
