ॐ ऋषभाय नम: ॐ (Om Rishabhaya Namah Om)

यह रचना आदिनाथ भगवान ऋषभदेव के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मबोध का भावपूर्ण गीत है। इसमें उनके द्वारा मानव समाज को दी गई संस्कृति, कृषि, ज्ञान, संयम और आत्मा के विज्ञान का सुंदर वर्णन है। यह वंदना हमें चरित्र, तप और चेतना की महत्ता समझाती है तथा जीवन को संयममय और सार्थक बनाने की प्रेरणा देती है। 

 

ॐ ऋषभाय नम: ॐ

🎶 लय – संयममय जीवन हो 

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ 

 

ॐ ऋषभाय नम: ॐ

 

ऋषभ वृषभ की संस्कृति ने ही, 

युग को दिया सहारा,

अद्भुत तेज तुम्हारा।

 

कृषि की विद्या दे बन पाए, 

धाता और विधाता,

मसि की विद्या दे बन पाए, 

जीवन के निर्माता।

असि विद्या ने आर्थिक जग को,

भय से सदा उबारा।। 

 

खाने को रोटी है सब कुछ, 

है व्यापार व्यवस्था,

और सुरक्षा तंत्र प्रबल है, 

सुखदा सफल अवस्था।

चरित बिना सब अर्थहीन, 

यह तुमने सत्य निहारा।। 

 

आत्मा का विज्ञान नहीं, 

तब कैसे चरित फलेगा,

धत्तूरे का बीज उप्त वह, 

आम कहाँ से देगा?

चेतन का संधान जरूरी, 

चमका एक सितारा।।

 

आत्मा के तुम प्रथम प्रवक्ता, 

चित्र पूर्ण बन पाया,

तुम विदेह बन रहे देह में, 

तप का तेज बढ़ाया।

वर्षीतप के आदि पुरुष तुम, 

तप ने रूप निखारा।।

 

चंचलता का करें विसर्जन, 

स्वयं स्वयं को जानें,

संयम के निर्मल दर्पण में, 

अपने को पहचानें। 

‘महाप्रज्ञ’ ऋषभाय नम: ॐ 

जग में हुआ उजारा।। 

 

‘महाप्रज्ञ’ ऋषभाय नम: ॐ 

सबको मिला किनारा।।

 

यह वंदना हमें भगवान ऋषभदेव के आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती है। संयम, तप और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलकर ही जीवन सार्थक बनता है और समाज में सच्चा उजाला फैलता है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏