म्हारी चेतना में प्रभु रो नाम है (Mhari Chetna Mein Prabhu Ro Naam Hai)

यह आध्यात्मिक गीत आत्मजागरण, आत्मचिंतन और प्रभु-स्मरण का सुंदर संदेश देता है। इसमें बताया गया है कि सच्चा सुख बाहरी संसार में नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मा में है। जीवन की नश्वरता को समझते हुए मनुष्य को मोह-माया से ऊपर उठकर अपने अंतर्मन को शुद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए। प्रभु का नाम, निर्मल भावना और जागृत चेतना ही जीवन की वास्तविक संपदा हैं। 

 

म्हारी चेतना में प्रभु रो नाम है

🎶 लय – कितनी खूबसूरत ये  

✍🏻 रचयिता – मुनि बुद्धमल्लजी 

 

म्हारी चेतना में प्रभु रो नाम है, 

प्रभु रो नाम है, प्रभु रो नाम है, 

म्हारी आत्मा खुद प्रभुता-धाम है।।

 

जगत रा है सौ झमेला, 

के पतो कुण कै करैला? 

कुण जियैला कुण मरैला? 

काया पथ में पल-भर विश्राम है।।

 

एकलो आणो र जाणो, 

थिर नहीं कोई ठिकाणो। 

बदलतो ही रहै पाणो, 

माया मोह में उलझ्यो बेकाम है।।

 

स्वयं रै भीतर निहारूं, 

मलिनता मन री बुहारूं। 

आंतरिक लय नै सवारूं, 

जागै सो रयो जो म्हारो राम है?

 

गई वेला मुड़ नै आवै, 

जागतै नै कुण जगावै? 

जो इशारो समझ पावै, 

बीं-रै हाथ में ई जग री लगाम है।।

 

हो सदा तन-मन निरामय, 

वचन हो हित-मित सुधामय। 

भावना निर्मल दयामय, 

आस्था ‘बुद्ध’ की आ अति उद्दाम है।।

 

यह गीत हमें अपने भीतर झांकने, समय का मूल्य समझने और प्रभु-स्मरण में जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है। निर्मल विचार, दया और आत्मजागृति ही सच्ची शांति तथा आनंद का मार्ग हैं।

🙏जय जिनेंद्र🙏