यह भजन आत्मिक अनुभूति और प्रभु-स्मरण की गहराई को सरल शब्दों में व्यक्त करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्रभु का नाम और उनकी उपस्थिति हर साँस, हर क्षण और हर अनुभव में समाई रहती है। शब्द-शब्द, स्वर-स्वर और ध्यान-मनन के माध्यम से साधक अपने भीतर बैठे स्वामीजी को अनुभव करता है। यह रचना निरंतर जागरूकता, प्रेम और आत्म-समर्पण का भाव जगाती है तथा मन को भीतर की ओर मोड़ने की प्रेरणा देती है।
म्हारै साँस-साँस में बोलै रे! सांवरिया स्वामीजी
🎶 लय – परी बालो रे …
म्हारै साँस-साँस में बोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।
ओ परवत है राई है ओलै रे!
गुण-दरिया स्वामीजी।।
निजर पसार निहारूँ,
सामां उभा दीसै स्वामीजी।
पल-पल विष में अमृत घोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
बात-बात में, शब्द-शब्द में,
घुर-फिर आवै स्वामीजी।
म्हारै घूमै ओलै-दोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
कान लगार सुणूँ तो,
हर स्वर-स्वर में गूँजै स्वामीजी।
म्हांरा अन्तर श्रुति-पट खोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
आँख मूँद कर ध्यान धरूँ तो,
घट में बैठ्या स्वामीजी।
म्हांरो भीतरलो टंटोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
समय-समय पर सावधान भी,
करता रेवै स्वामीजी।
हेलो देवै होलै-होलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
मैं स्वामीजी में रम ज्याऊँ,
म्हारै में ज्यूँ स्वामीजी।
‘चम्पक’ मनड़ो यूँ झकझोलै रे!
सांवरिया स्वामीजी।।
यह भजन आत्मा और परमात्मा की निरंतर अनुभूति को प्रकट करता है। हर श्वास, हर शब्द और हर क्षण में स्वामीजी की उपस्थिति का बोध कराते हुए, यह साधक को जागरूकता, भक्ति और आंतरिक शुद्धि की प्रेरणा देता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
