यह रचना आचार्य श्री महाप्रज्ञ की गहन चिंतनशील वाणी को व्यक्त करती है। इसमें वर्तमान युग की हिंसा, भोगवाद, भय और करुणा के क्षय पर प्रश्न उठाए गए हैं। कविता अवतार के उद्देश्य, मानव-एकता, मैत्री, अभय और अनेकांत के संदेश को सरल किन्तु प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह रचना हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है और यह स्मरण कराती है कि आज के संकटग्रस्त समय में करुणा, सहनशीलता और महावीर-भाव ही सच्चा मार्गदर्शन दे सकते हैं।
जिसकी आज जरूरत उसने
🎶 लय – बाजरे री रोटी पोई
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ
जिसकी आज जरूरत,
उसने क्यों पहले अवतार लिया?
मंद चांदनी चंदा की,
क्यों सूरज को उपहार दिया?
तुम आये तब इस धरती ने,
अपना रूप संवारा था।
मनुज-एकता की वाणी से,
उसको मिला सहारा था।
मानव अपना भाग्य विधाता,
पौरुष को आधार दिया।।
जटिल समस्या के इस युग को,
उस युग से कैसे तोलें।
हिंसा से बहरी दुनिया में,
बोलें तो कैसे बोलें।
पोत कहां वह जिससे तुमने,
इस सागर को पार किया?
करुणा का जल सूख रहा है,
दुर्लभ पीने का पानी।
बना रहा बाजार आज के,
ज्ञानी को भी आज्ञानी।
भोगवाद के महारोग का,
प्रभु कैसे उपचार किया?
उतरो, उतरो हे करुणाकर!
हृदयांगण में तुम उतरो।
अभय-मंत्र के उद्गाता,
अणु-युग के भय को दूर करो।
मैत्री की निर्मल धारा ने,
शांति-शोध को द्वार दिया।।
ऋद्धि-सिद्धि का वर दो,
वर्धमान का पद पाएं।
सहनशील बन विक्रमशाली,
महावीर हम बन जाएं।
अनेकांत ने निराकार को,
पल भर में आकार दिया।।
यह रचना हमें आज के युग की चुनौतियों पर सोचने को विवश करती है। करुणा, मैत्री, अभय और अनेकांत के मूल्यों को अपनाकर ही मानव अपने भय से मुक्त होकर शांति और सच्चे मानवत्व की ओर अग्रसर हो सकता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
