गुरुवर! एकर पधारो पाछा आंगणै (Guruvar! Ekar Padharo Paachha Aangane)

यह भावपूर्ण गीत गुरु-वियोग की गहरी पीड़ा और गुरुदेव के प्रति अटूट श्रद्धा को व्यक्त करता है। इसमें शिष्य अपने प्रिय गुरु की अनुपस्थिति से उत्पन्न खालीपन, स्मृतियों और मिलन की आकांक्षा का मार्मिक वर्णन करता है। गुरु के साथ बिताए गए स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और आध्यात्मिक क्षणों को याद करते हुए हृदय उन्हें पुनः अपने बीच देखने की प्रार्थना करता है।

 

गुरुवर! एकर पधारो पाछा आंगणै

🎶 लय – मोरीया

✍🏻 रचयिता – मुनि मोहनलालजी ‘आमेट’ 

 

गुरुवर! एकर पधारो पाछा आंगणै। 

लागै साव अलूणा, आप बिना सै स्वाद।।

 

गुरुवर! 

बगिया तो बा की बा है सोहणी। 

पण आं सांसां कोनी, 

सौरभ रो आह्लाद।।

 

गुरुवर! 

हुवै बीयांई रातां पाछली। 

हूंती आप थकां ज्यूं, 

सतरंगी स्वाध्याय।।

 

गुरुवर! 

सन्ध्या पड़िकमणो यूं हीं साथ में। 

पण उण टणकारे हित, 

कान तरस ए जाय।।

 

गुरुवर! 

जोड़ी तो जुगल आज भी पाट पै। 

पण ना सिंह गर्जना, 

समोसरण संभलाय।।

 

गुरुवर! 

दुनियां उलटे बीयाईं रोज-री। 

पण वो मुखड़ो खोजत, 

आश अलूधी जाय।।

 

गुरुवर! 

धरती इसो तो गुन्हों कै कर्यो। 

पल में पलकारो कर, 

जाय बस्या गिगनार।।

 

गुरुवर! 

खिण-खिण सिमरै है सांसां स्वाम नै। 

आछा दिन जो सगळा, 

दिया आप दातार।।

 

गुरुवर! 

ओ ही दिन आतो कै कै कोड ले। 

आंख्यां-आली लेकर, 

आयो आज उजास।।

 

गुरुवर! 

पीड़ा में पुलकन आ ही देवता। 

देग्या मालिक म्हांनै, 

पूनम रो परकास।।

 

यह गीत गुरु के प्रति प्रेम, समर्पण और विरह की भावनाओं से ओतप्रोत है। गुरुदेव की स्मृतियां साधकों के जीवन को आलोकित करती हैं और उनके आदर्श सदैव प्रेरणा प्रदान करते हैं। 

🙏जय जिनेंद्र🙏