गुरुदेव! थांरी खिण-खिण याद सतावे, आर्यदेव! (Gurudev! Thari Khin-Khin Yaad Satave, Aryadev!)

यह भजन “गुरुदेव! थांरी खिण-खिण याद सतावे, आर्यदेव!” आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित एक भावपूर्ण स्तुति है। इसमें गुरुदेव के प्रति गहरी श्रद्धा, प्रेम और विरह की भावना व्यक्त होती है। भजन में गुरुदेव के त्याग, अनुशासन, आत्मबल और सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का सुंदर वर्णन किया गया है।

 

गुरुदेव! थांरी खिण-खिण याद सतावे, आर्यदेव!

🎶 लय – उमराव! थांरी बोली प्यारी  

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

गुरुदेव! थांरी खिण-खिण याद सतावै,

आर्यदेव!

गुरुदेव! थांरी स्मृतियां विरह जगावै , 

आर्यदेव!

गुरुदेव! जी हो SSS आर्यदेव!

 

बड़ी बखत इण जगत स्यूं, 

बण्यो हृदय बेचैन,

सर्व-विरत पथ चरण धर, 

दी दुनिया नै देन।

गुरुदेव! बा बेचैनी घणी सुहावै, 

आर्यदेव!

 

श्रद्धा-बल-चारित्र-बल, 

और मनोबल मूल,

करणो या मरणो क्रयो, 

करड़ो काम कबूल।

गुरुदेव! वो आत्म-बल हृदय दृढ़ावै, 

आर्यदेव!

 

माँ को, गुरु को, शिष्य को, 

छोड़्यो तन रो मोह,

एक लक्ष्य पर अटल मन, 

सदा सफल आरोह।

गुरुदेव! बो आरोहण, स्मृति सरसावे, 

आर्यदेव!

 

आस्था अपणै साध्य में, 

साधन में लयलीन,

अमित भक्ति आराध्य में, 

सब कुछ कियो विलीन।

गुरुदेव! बो इतिहास विकास बढ़ावै, 

आर्यदेव!

 

कोरी रूढ़-परम्परा, 

मत ताणो मतिमान,

‘दुल्ह देह’ को लाभ ल्यो, 

करो तत्व-पहचान।

गुरुदेव! वा वाणी रूं-रूं रम ज्यावै, 

आर्यदेव!

 

संवळी ही वेदी सदा, 

बणी जु अँवळी बात,

करी जुगो-जुग जीवती, 

सत्पुरुषां री ख्यात।

गुरुदेव! बा समवृत्ति साधना ल्यावै, 

आर्यदेव!

 

राखी ही बढ़ती सदा, 

जिन-शासन री शान,

जैन-जगत क्यूं भूलसी, 

ओ थांरो अहसान।

गुरुदेव! बो अनुशासन गण विकसावै, 

आर्यदेव!

 

सिद्धान्तां पर स्थिर सबल, 

विरल आत्म-विश्वास,

करी कड़ी आलोचना, 

पहुंच अतुल आकाश।

गुरुदेव! बा सिद्धान्तवादिता चावै, 

आर्यदेव!

 

सतरै सुधरी स्यूं चल्या, 

चलता बिना विराम,

साठै तेरस भाद्रवी, 

सिरियारी लग स्वाम।

गुरुदेव! बा चर्या ‘तुलसी’ मन भावै, 

आर्यदेव!

 

यह भजन गुरुदेव की महानता और उनके आदर्शों को याद दिलाता है। इससे हमें प्रेरणा मिलती है कि हम भी श्रद्धा, अनुशासन और साधना के मार्ग पर चलें तथा जिन-शासन की सेवा में अपना जीवन सार्थक बनाएं। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏