यह भक्ति-गीत गुरुदेव के प्रति गहरी श्रद्धा, प्रेम और विरह भाव को व्यक्त करता है। इसमें शिष्य अपने गुरु के दर्शन की तीव्र इच्छा, उनकी महिमा, करुणा और लोककल्याणकारी कार्यों का स्मरण करता है। गुरु को माता-पिता समान रक्षक, नैतिकता के प्रेरक और जन-जन की आस्था का केंद्र बताया गया है। उनकी अनुपस्थिति में मन व्याकुल रहता है और उनकी स्मृतियां निरंतर हृदय को भाव-विभोर करती हैं।
गुरुदेव! थांरी यादां घणी सतावै रात-दिन
🎶 लय – उमराव थांरी बोली
✍🏻 रचयिता – मुनि बुद्धमल्लजी
गुरुदेव!
थांरी यादां घणी सतावै रात-दिन,
गुरुदेव!
मनड़ो दरसण नै ललचावै रात-दिन।
गण देवता हो, आत्म-देव।।
कलजुग भी सतजुग बण्यो,
पद रज तणै प्रताप,
लाखां लोगां रा हर्या,
भव-भव रा संताप।
गुरुदेव!
थांरी महिमा चेतै आवै रात-दिन।।
पिता जिसी रखवाल ही,
हो माता सो हेज,
जिनवर सो अतिशय घणो,
सूरज-सो तप तेज।
गुरुदेव!
थांरी मुद्रा मन हरसावै रात-दिन।।
नैतिकता नै बल दियो,
कस्यो जगत उद्घार,
जस थांरो शिखरां चढ्यो,
गुण गावै संसार।
गुरुदेव!
थांरो गौरव बढ़तो जावै रात-दिन।।
अनुशासन राख्यो जबर,
जबर व्यवस्था ढंग,
आकर्षण चुंबक जिस्यो,
मिटै न लाग्यो रंग।
गुरुदेव!
थां बिन सारो शून्य लखावै रात-दिन।।
जन-मन रा थे देवता,
उत्तम आस्था-धाम,
‘बुद्ध’ हियै में रम रह्या,
बण जीवन-विश्राम।
गुरुदेव!
थांरी ओळ्यूं नींद जगावै रात-दिन।।
यह गीत गुरु के प्रति अटूट भक्ति, सम्मान और आत्मीय लगाव का सुंदर चित्रण है। गुरुदेव के आदर्श, उपदेश और व्यक्तित्व आज भी भक्तों के जीवन को दिशा, शांति और प्रेरणा प्रदान करते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
