दोनूं हाथ जोड़कर करूं (Donu Hath Jodkar Karu)

यह रचना आचार्य श्री तुलसी जी की एक भावपूर्ण स्तुति है, जिसमें साधु-जीवन की महिमा, संयम, तप और परोपकार का सुंदर चित्रण है। इसमें गुरु-अनुशासन, पाँच महाव्रत, आत्म-साधना और निष्काम कर्म के आदर्शों को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। यह पद हमें सच्चे साधु के चरणों में नमन करना, उनके उपदेशों को जीवन में उतारना और आध्यात्मिक मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ना सिखाता है।

 

दोनूं हाथ जोड़कर करूं

🎶 लय – असल दुपट्टो फूल गुलाब  

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

दोनूं हाथ जोड़कर करूं, 

साधु रै चरणां में परणाम,

चरणां में परणाम नाम शिर, 

करतां पाप पलावै।

पावै अजरामर शिव-धाम।।

 

आत्म-साधना करै निरन्तर, 

बो ही साध कहावै।

भावै विमल भाव अविराम।।

 

पांच महाव्रत करण-जोग-जुत, 

आजीवन सुध पाळै।

भालै शिव-मग आठूं याम।।

 

निज जीवन-धन गुरु-अनुशासन, 

निशदिन शिर धर विचरै।

करणी करै सदा निष्काम।।

 

पर-उपकार परायण पल-पल, 

भल उपदेश सुणावै।

पावै प्रतिपल परमाराम।

 

अप्रतिबन्ध-विहारी भारी, 

निज पर आतम तारै।

सारै ‘तुलसी’ वांछित काम।।

 

यह रचना हमें साधु-जीवन के आदर्शों को हृदय में धारण करने की प्रेरणा देती है। गुरु-भक्ति, संयम, सेवा और आत्म-साधना के मार्ग पर चलकर ही जीवन को पवित्र, सार्थक और शांतिमय बनाया जा सकता है।

🙏 जय जिनेंद्र 🙏