यह भजन आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित एक करुण भाव से भरा आध्यात्मिक पद है। इसमें जीवात्मा की असहाय अवस्था और संसार-रूपी भवसागर से पार होने की प्रार्थना व्यक्त की गई है। गुरु को नाविक मानकर, उनकी शरण में जाकर उद्धार की विनती की गई है। सरल भाषा, गहरी भावनाएँ और आत्मसमर्पण की भावना इस रचना को विशेष बनाती हैं।
धरमाचारज! मुझे तारो
🎶 लय – पानी में मीन प्यासी
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
धरमाचारज! मुझे तारो,
मैं लीन्हो शरण तुम्हारो।
है और न कोई चारो।।
भवसागर है अथग अमित जल,
नहिं है निकट किनारो।
जबर-ज्वार रै झोलां मांही,
बीत्यो जाय जमारो।।
साश्रव आतम-नाव पुराणी,
पल-पल जल पेसारो।
डगमग-डगमग डोलै थां बिन,
कुण है खेवणहारो?
डगर-डगर में मगर भयंकर,
पग-पग पर भय बांरो।
अै तूफान उठै हड़बड़कै,
धड़कै दिल दुनियां रो।।
आय लगी अब बीच भंवर में,
मन-मांझी मतवारो।
इण बिरियां में इण दरिया में,
साहिब! शरणो थांरो।।
प्रतिनिधि आप प्रथम-पद का हो,
आर न पार गुणां रो।
करुण पुकार सुणो सानुग्रह
‘तुलसी’ पार उतारो।।
यह भजन शरणागति, करुणा और गुरु-कृपा की महत्ता को उजागर करता है। भवसागर से पार होने का मार्ग केवल सद्गुरु की शरण और उनकी अनुकम्पा से ही संभव है, यही इसका मूल संदेश है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
