भिक्षु भिक्षु भजन हो, तन से, मन से और वचन से (Bhikshu Bhikshu Bhajan Ho, Tan Se, Man Se Aur Vachan Se)

यह भजन जैन तेरापंथ के प्रथम आचार्य आचार्य भिक्षु के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण को प्रकट करता है। इसके रचयिता मुनि सुमेरमल जी (लाडनूँ) हैं। इस भजन में बताया गया है कि गुरु आचार्य भिक्षु का नाम श्रद्धा से स्मरण करने से जीवन में शांति, साहस और सही मार्ग मिलता है। यह भजन हमें सिखाता है कि हम तन, मन और वचन से गुरु के सिद्धांतों का पालन करें। 

 

भिक्षु भिक्षु भजन हो, तन से, मन से और वचन से

🎶 लय – संयममय जीवन हो

✍🏻 रचयिता – मुनि सुमेरमल जी (लाडनूँ)   

 

भिक्षु-भिक्षु भजन हो।

तन से, मन से और वचन से, 

प्रतिपल यही रटन हो।

भिक्षु-भिक्षु भजन हो।।

 

जब-जब जाप किया श्रद्धा से, 

अयि गुरुदेव तुम्हारा, 

तब-तब नष्ट अरिष्ट हुए सब, 

दुःख से मिला किनारा। 

देव ! तुम्हारे बतलाए मारग पर, 

सतत गमन हो।।

 

जब जब पड़ी जरूरत तुमने, 

सबको दिया सहारा, 

रहा न कोई कार्य शेष, 

गुरु जिसने तुम्हें पुकारा। 

मंत्र स्वयं है नाम तुम्हारा, 

यदि श्रद्धामय मन हो ।।

 

शिथिलाचार देखकर तेरा, 

हुआ हृदय विद्रोही, 

सत्य राह पर चलने के हित, 

देव बने निर्मोही। 

सिद्धांतों पर बने अडिग हम, 

निष्ठा ही जीवन हो।।

 

देव! तुम्हारा नाम हमारे, 

कण-कण में रम जाए, 

शासन की गौरव वृद्धि में, 

नव इतिहास बनाएं। 

‘मुनि सुमेर’ दीपानंदन का, 

युग-युग अभिनंदन हो।।

 

यह भजन हमें आचार्य भिक्षु के आदर्शों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। उनके नाम और सिद्धांतों को स्मरण करके हम संयम, श्रद्धा और सत्य के मार्ग पर चल सकते हैं तथा जैन शासन की सेवा कर सकते हैं। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏