यह सुंदर भजन साध्वी राजीमती जी द्वारा रचित है। इसमें आचार्य भिक्षु की पावन मूरत, उनके तप, त्याग और आदर्शों का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। भजन में बताया गया है कि आचार्य भिक्षु का जीवन तपस्या, समता और सत्य का प्रतीक है। उनकी प्रेरणा से अनेक लोगों के जीवन में धर्म का प्रकाश फैला।
भीखण री मूरत भावै, जपतां मनड़ो हरसावै
🎶 लय – प्रज्ञा के दीप जलेंगें
✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमती जी
भीखण री मूरत भावै,
जपतां मनड़ो हरसावै,
प्राणां स्यूं लागै प्यारो सांवरो,
हो म्हांनै!
प्राणां स्यूं लागै प्यारो सांवरो।।
सोनो सोटंच चमकतो,
बेहद अरुणाई हो,
कुन्दन सो बदन दमकतो,
जागी तरुणाई हो।
बाबैरी हुई कसौटी,
खाई कद ताती रोटी।।
पूरो करस्यां सब मिलजुल,
बाबै रो सपनो हो,
संत फकीरां रै ईं युग में,
होवै कुण अपणो हो।
तप री चिनगारी भारी,
सारी विपदावां हारी।।
कण-कण में बोल रही है,
थांरी कुर्बाण्यां हो,
छतरी में मंडी पड़ी है,
कितनी सहनाण्यां हो।
भिक्षु री बोध कहाण्यां,
कष्टां री अमिट निशाण्यां।।
माटी रो मोल चुकावण,
तपस्या स्वीकारी हो,
सोयो भगवान जगावण,
समता हद धारी हो।
जयवन्तो अपणो शासण,
महाप्रज्ञ रो दीपै आसन।।
यह भजन आचार्य भिक्षु के महान तप, त्याग और आदर्शों की याद दिलाता है। उनके जीवन से हमें धर्म, समता और सच्चे आचरण की प्रेरणा मिलती है। उनके बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
