आओ स्वामीजी! गुरु-गीता को फिर (Aao Swamiji! Guru Geeta Ko Phir)

यह भजन श्रद्धा, भक्ति और अनुशासन का सुंदर संदेश देता है। इसमें स्वामीजी से प्रार्थना की गई है कि वे गुरु-गीता का पाठ पुनः सुनाएँ और संघ में प्रेम व एकता का भाव जगाएँ। भजन में श्रावक-श्राविका को परस्पर प्रेम रखने और संगठन की शक्ति को समझने की प्रेरणा दी गई है। गुरु तुलसी और महाप्रज्ञ जी के अनुशासन व मर्यादा के महत्व को भी सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। 

 

आओ स्वामीजी! गुरु-गीता को फिर

🎶 लय – रूठ्योड़ा शिवशंकर

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ 

 

आओ स्वामीजी! 

गुरु-गीता को फिर से दोहराओ रे!

आओ स्वामीजी! 

अब पूरा मंगलपाठ सुनाओ रे।

आओ स्वामीजी !

 

‘हेत-परस्पर राखीज्यो’ यह गुरु-गीता की शिक्षा रे,

संघ-शक्ति का महामंत्र दीक्षा की दीक्षा रे!

 

प्रश्‍न एक है आज अनुत्तर श्रावक क्यों है न्यारा रे!

क्यों न प्रवाहित जीवन में गंगा की धारा रे!

 

‘श्रावक और श्राविका सारा हेत परस्पर राखीज्यो,

संघ संगठन रा मीठा-मीठा फल चाखीज्यो!’

 

पूरा पाठ बने, अब ऐसा फिर से मंत्र सिखाओ रे,

गण-नंदन की कली कली को पुन: सजाओ रे!

 

देव! तुम्हारी वाणी में है तप का तेज निराला रे,

देव! तुम्हारा चिंतन सचमुच इमरत प्याला रे!

 

गुरु तुलसी ने अनुशासन का भारी मूल्य बढ़ाया रे,

सफल बना, जिसने अनुशासन शीश चढ़ाया रे!

 

‘महाप्रज्ञ’ अब अनुशासन का अनुपम कवच बनाओ रे,

मर्यादा का मोच्छव तारानगर मनाओ रे!

 

यह भजन हमें प्रेम, अनुशासन और संगठन की शक्ति का स्मरण कराता है। गुरु-वाणी से जीवन को सजाने और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यही इसकी मुख्य भावना है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏