यह सांयकालीन गुरु वंदना जैन परंपरा में गुरु के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और समर्पण की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। इस वंदना में गुरु को युग-प्रणेता, युग-प्रचेता और जीवन-पथ का पथप्रदर्शक माना गया है। संध्या समय इसका पाठ आत्मचिंतन, विनय और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। गुरु के तप, अनुशासन और करुणा से साधक को दिव्य जीवन की प्रेरणा मिलती है तथा भव-सागर से पार होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
युग प्रणेता, युग प्रचेता - सांयकालीन गुरु वंदना
युग प्रणेता, युग प्रचेता,
युग पुरुष लो वंदना।
विनयनत बद्धांजलि हम,
कर रहे अभिवंदना॥
धन्य है सौभाग्य तुम से,
कुशल अनुशास्ता मिले।
दिव्य जीवन पा तुम्हीं से,
भव्य शतदल हैं खिले॥
तपो युग-युग धर्म शासक,
जय-विजय पग-पग वरो।
तुम्हीं नैया के खेवैया,
पार भव-जल से करो॥
यह गुरु वंदना मन में विनय, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव जाग्रत करती है। इसके पाठ से आत्मबल बढ़ता है और गुरु-कृपा से जीवन में सही दिशा, शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
