मंगलीक सरणां च्यार – हिग्दै धारीजे, हो भविजन! (Manglik Sarna Chyaar – Higdai Dharije, Ho Bhavijan!)

यह मंगल पाठ चार पवित्र शरणों की महिमा बताता है—अरिहंत, सिद्ध, साधु और धर्म। कवि समझाते हैं कि इनका सच्चे मन से स्मरण करने पर भय, रोग, बाधा और दुख दूर होते हैं। जीवन में सुख, शांति, रक्षा और शुभ फल मिलते हैं। जो व्यक्ति रोज श्रद्धा से इन शरणों को याद करता है, उसका मन मजबूत बनता है और आत्मकल्याण की राह खुलती है। 

 

मंगलीक सरणां च्यार - हिग्दै धारीजे, हो भविजन!

हिग्दै धारीजे, हो भविजन ! 

मंगलीक सरणां च्यार। 

प्रात उठी नित समरीजे हो भविजन ! 

मंगलीक सरणां च्यार। 

आपद मिटै सम्पद मिले हो भविजन ! 

दौलत नां दातार।।

 

अरिहन्त सिद्ध साधु तणां हो भविजन ! 

केवलि-भाषित-धर्म। 

ए च्यारूं जपतां थकां हो भविजन ! 

टूटै आडूं ही कर्म।।

 

ए शरणां सुखकारीया हो भविजन ! 

ए शरणां मंगलीक। 

ए शरणां उत्तम कह्या हो भविजन ! 

ए शरणां तहतीक।।

 

सुखसाता बरतै घणी हो भविजन ! 

जे ध्यावै नरनार। 

पर भव जातां जीव नैं हो भविजन ! 

एह तणो आधार।।

 

डाकण साकण भूतड़ा हो भविजन ! 

सिंह चिता नैं सूर। 

वैरी दुश्मण चोरटा हो भविजन ! 

रहे सदाई दूर।।

 

निशि दिन यां नैं ध्यावतां हो भविजन ! 

पामैं परमानन्द । 

कमी नहीं किण बात री हो भविजन ! 

सेव करै सुरइन्द।।

 

गेलै घाटै चालंता हो भविजन ! 

राते दिवस मझार। 

गांवां नगरां विचरतां हो भविजन ! 

विध्न निवारण हार।।

 

हुण सरिखा सरणां नहीं हो भविजन ! 

इण सरिखी नहीं नाव। 

हुण सरिखो मन्त्र नहीं हो भविजन ! 

जपतां बढज्या आव।।

 

राखो इणरी आसथा हो भविजन !

नेडो न आवै रोग। 

बरतै आणन्द जीव नैं हो भविजन !  

एह तणै संयोग।।

 

मन चिंतित बांछा फलै हो भविजन ! 

बरतै कोड कल्याण। 

शुद्ध मना नित ध्यावतां हो भविजन ! 

निश्चित पद निरवाण।।

 

संवत अठारह बावन्ने हो भविजन ! 

पाली सेखै काल। 

रिषी चौथमलजी इम कहै हो भविजन ! 

सुणज्यो बाल गोपाल।।

 

इस रचना का संदेश है कि चारों शरणों पर श्रद्धा रखें और उनका स्मरण करें। इससे शांति, साहस और विश्वास बढ़ता है, बाधाएँ दूर होती हैं और आत्मा कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ती है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏