यह बड़ी साधुवंदना अनेक तीर्थंकरों, गणधरों, मुनियों, साध्वियों और महान तपस्वियों के पवित्र जीवन का स्मरण कराती है। इसमें उनके त्याग, संयम, तप, ज्ञान, करुणा और धर्म पालन का सुंदर वर्णन है। कई राजाओं, रानियों और गृहस्थों ने संसार छोड़कर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया। यह वंदना हमें महापुरुषों के गुण याद रखने, उनका आदर करने और सच्चे धर्ममार्ग पर चलने की सदा प्रेरणा देती है।
बड़ी साधुवंदना - नमूं अनन्त चौबीसी ऋषभादिक महावीर
🎶लय – सुख कारण भवियण
नमूं अनन्त चौबीसी, ऋषभादिक महावीर।
आर्य क्षेत्र मां, घाली धर्म नों सीर।।1।।
महा अतुल बली नर, शूरवीर नैं धीर।
तीर्थ प्रव्रतावी पहोंता भवजल तीर।।2।।
सीमंधर प्रमुख, जघन्य तीर्थंकर बीस।
छै अढीद्वीप मां, जयवंता जगदीश।।3।।
एक सौ नैं सित्तर, उत्कृष्ट पदे जगदीश।
धन्य मोटा प्रभुजी, जेहने नमावूं शीश।।4।।
केवली दोय कोड़ी, उत्कृष्टा नव क्रोड़।
मुनि दोय सहस्र कोड़ी, उत्कृष्ट नव सहस्र कोड़।।5।।
विचरै छै विदेहे, मोटा तपसी घोर।
भावे करि वंदूं, टाले भव नीं खोड़ ।।6।।
चौबीसे जिन नां, सघला ए गणधार।
चवदैसौ ने बावन, ते प्रणमूं सुखकार।।7।।
जिन-शासन-नायक, धन्य श्री वीर जिणंद।
गौतमादिक गणधर, बर्ताव्यो आणंद।।8।।
श्री ऋषभदेव नां, भरतादिक सौ पूत।
वैराग्य मन आणी, संयम लियो अद्भुत।।9।।
केवल उपजायो, करि करणी करतूत।
जिनमत दीपायो, सघला मोक्ष पहूंत।।10।।
श्री भरतेश्वर नां, हुवा पटोधर आठ।
आदित्य जशादिक, पहोंता शिवपुर बाट।।11।।
श्री जिन अन्तर नां, हुवा पाट असंख।
मुनि मुक्ति पहोंता, टाली कर्म नो बंक।।12।।
धन्य कपिल मुनीश्वर, नमी नमूं अणगार।
जेणे तत्क्षण त्याग्यो, सहस्र रमणी परिवार।।13।।
मुनिवर हरिकेशी, चित्त मुनीश्वर सार।
शुद्ध संयम पाली, पाम्या भव नों पार।।14।।
बलि इखुकार राजा, घर कमलावती नार।
भग्गू नैं जशा, तेहनां दोय कुमार।।15।।
छति ऋद्धि छांडी नैं, लीधो संयम भार।
इम अल्प काल मां, पाम्या मोख दुवार।।16।।
बलि संजती राजा, हिरण आहिड़े जाय।
मुनिवर गदभाली, आण्यो मारग ठाय।।17।।
चारित्र लेई नैं, भेंट्या गुरु नां पाय।
क्षत्री राजऋषीश्वर, चर्चा करी चित्त लाय।।18।।
बलि दशूं चक्रवर्ती, राज्य रमणी ऋद्धि छोड़।
दश मुक्ति पहोंता, कुल ने शोभा चोड़।।19।।
इण अवसर्प्पिणी मां, आठ राम गया मोख।
बलभद्र मुनीश्वर, गया पंचम देवलोक।।20।।
दशार्णभद्र राजा, वीर वांद्या धरि मान।
पछे इन्द्र हटायो, दियो छह काय अभयदान।।21।।
करकंडू प्रमुख, च्यारूं प्रत्येक बुद्ध।
मुनि मुक्ति पहुंच्या, जीत्या कर्म महा जुद्ध।।22।।
धन्य मोटा मुनिवर, मृगापुत्र जगीश।
मुनिवर अनाथी, जीता राग नैं रीस।।23।।
वलि ‘समुद्रपाल मुनि, राजमती रहनेम।
केशी नैं गौतम, पाम्या शिवपुर सेम।।24।।
धन्य विजयघोष मुनि, जयघोष बलि जाण।
श्री गर्गाचार्य, पहुं’च्या छै निर्वाण।।25।।
श्री उत्तराध्ययन मां, जिनवर किया बखाण।
शुद्ध मन सूं ध्यावो, मन में धीरज आण।।26।।
बली खन्धक संन्यासी, राच्यो गोतम स्नेह।
महावीर समीपे, पंच महाव्रत लेह।।27।।
तप कठिन करीनै झोंखी अपणी देह।
गया अच्युत देवलोके, चवलेसी भव छेह।।28।।
बलि ऋषभदत्त मुनि, सेठ सुदर्शण सार।
शिवराज ऋषीश्वर, धन्य गांगेय अणगार।।29।।
शुद्ध संयम पाली, पाम्या केवल सार।
ए चारूं मुनिवर, पहुंच्या मोक्ष मझार।।30।।
भगवन्त नीं माता, धन्य धन्य सति देवानन्दा।
बलि सती जयन्ती, छोड़ दिया घर फन्दा।।31।।
सति मुक्ती पहुंची, बलि ते वीर नैं वन्द।
महासती सुदर्शना, घणी सतियां नां वृन्द।।32।।
बलि कार्तिक सेठे, पड़िमा ग्रही शूरवीर।
जिम्यो मोरां ऊपर, तापस बलती खीर।।33।।
पछी चारित्र लीधु, मित्र एक सहंस अठ धीर।
मरी हुआ शक्रंद्र, चव लेसी भव तीर।।34।।
बलि राय उदाई, दियो भाणेजा राज।
पछी चारित्र लेई, सारया आतम काज।।35।।
गंगदत्त मुनि आनन्द, तारणतरण जिहाज।
मुनि कोशलजी हो, दियो घणां नैं साज।।36।।
धन्य सुनक्षत्र मुनिवर, सर्वानुभूति अणगार।
आराधक हुई नैं, गया देवलोक मझार।।37।।
चवि मुक्ती जासे, बलि सिंह मुनीश्वर सार।
बीजा पण मुनिवर, भगवती में अधिकार।।38।।
श्रेणिक नो बेटो, मोटो मुनिवर मेघ।
तजी आठ अन्तेउर, आण्यो मन संवेग।।39।।
वीर पै व्रत लेई नैं, बांधी तप नीं तेग।
गया विजय विमाणे, चव लेसी शिव वेग।।40।।
धन्य थावच्चा पुत्र, तजी बत्तीसूं नार।
तेह साधे निकल्या, पुरुष एक हजार।।41।।
सुकदेव संन्यासी, एक सहस्र शिष्य लार।
पांचसौ सूं सेलक, लीधो संयम भार।।42।।
सर्व सहस्र अढ़ाई, घणा जीवा नैं तार।
पुंडरीक गिरि ऊपर, कियो पादोपगम संथार।।43।।
आराधक होई, कीधो खेवो पार।
हुआ मोटा मुनिवर, नाम लियां निस्तार।।44।।
धन्य जिनपाल मुनीश्वर, दोय जणा हुआ साध।
गया प्रथम देवलोके, मोक्ष जासे आराध।।45।।
श्री मल्लि नां छह मित्र, महाबल प्रमुख मुनिराय।
सर्व मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय।।46।।
बलि जितशत्रु राजा, सुबुद्धि नामे प्रधान।
पोते चारित्र लेईनै, पाम्या मोक्ष निधान।।47।।
धन्य तेतली मुनिवर, दियो छह काय अभयदान।
पोटिला प्रतिबोध्या, पाम्यो केवल ज्ञान।।48।।
धन्य पांचू पांडव, तजी द्रौपदी नार।
स्थविरां नीं पासे, लीधो संयम भार।।49।।
श्री नेमि वंदण नो, एहवो अभिग्रह कीध।
मास-मासखमण तप, शत्रुञ्जय जई सीध।।50।।
धर्मघोष तणों शिष्य, धर्मरुची अणगार।
कीड्यां नीं करुणा, करी दया दिल धार।।51।।
कडुआ तुंबा नों, कीधो सघलो आहार।
सर्वार्थ सिद्ध पहोंता, चव लेसी भवपार।।52।।
बलि पुंडरीक राजा, कुंडरीक डिगियो जाण।
पोते चारित्र लेई नैं, न घाली धर्म मां हाण।।53।।
सर्वार्थ सिद्ध पहोंता, चव लेसी निर्वाण।
श्री ज्ञाता सूत्र में, जिनवर कर्या बखाण।।54।।
गोतमादिक कुमरां, सगा अठारै भ्रात।
सर्व अन्धक वृष्णी-सुत, धारणी ज्यांरी मात।।55।।
तजी आठ अन्तेउर, काढ़ी दीक्षा नीं बात।
चारित्र लेईनैं, कीधो मुनि नो साथ।।56।।
श्री अनीक सेनादिक, छऊं सहोदर भाय।
वसुदेव नां नन्दन, देवकी ज्यांरी माय।।57।।
भद्दिलपुर नगरी, नाग गाहावई जाण।
सुलसां घर बधिया, सांभल नेमि नी बाण।।58।।
तजी बत्तीस-बत्तीस अन्तेउर, निकलिया छिटकाय।
नल कुबेर समाणा, भेंट्या नेमि नां पाय।।59।।
करी छठ-छठ पारण, मन में वैराग्य लाय।
एक मास संथारे, मुक्ति विराज्या जाय।।60।।
बलि दारुण सारण, सुमुख दुमुख मुनि राय।
बलि कुमर अनादृत, गया मुक्तिगढ़ मांय।।61।।
बसुदेव नां नन्दन, धन्य-धन्य गजसुकुमाल।
रूपे अति सुंदर, कलावन्त वय वाल।।62।।
श्री नेमि समीपे, छोड्यो मोह जंजाल।
भिक्षु नीं पड़िमा, ग्रही मशाण महाकाल।।63।।
देखी सोमिल कोप्यो, मस्तक बांधी पाल।
खेरी नां खीरा, सिर ठविया असराल।।64।।
मुनि नजर न खंडी, मेटी मन नीं झाल।
परीषह सहीनैं, मुक्ति गया तत्काल।।65।।
धन्य जाली मयाली, उवयालादिक साध।
संबुक नैं प्रद्युम्न, अनिरुद्ध साधु अगाध।।66।।
बलि सचनेमि दृढनेमि, करणी कीधी निरबाध।
दशे मुक्ती पहुंता, जिनवर बच आराध।।67।।
धन्य अर्जुनमाली, कर्यो कदाग्रह दूर।
वीर पै व्रत लेई नैं, सत्यवादी हुआ शूर।।68।।
करी छठ छठ पारण, क्षमा करी भरपूर।
छह मासे मांही, कर्म किया चकचूर।।69।।
कुमर अइमुत्ते, दीठा गौतम स्वाम।
सुणी वीर नी वाणी, कीधो उत्तम काम।।70।।
चारित्र लेई नैं, पहोंता शिवपुर ठाम।
धुर आदि मकाई अन्त अलक्क मुनि नाम।।71।।
बलि कृष्णराय नीं, अग्रमहिषी आठ।
पुत्रबहू दोयां, संच्या पुण्य नां ठाट।।72।।
यादव कुल सतियां, टाली दुःख ओचाट।
पहोंती शिवपुर में, ए छै सूत्र नों पाठ।।73।।
श्रेणिक नीं राणी, काली आदिक दश जाण।
दशे पुत्र वियोगे, सांभली वीर नीं बाण।।74।।
चन्दनबाला पै, संयम लेई जाण।
तप करि देह झोंखी, पहोंती छै निर्वाण।।75।।
नन्दादिक तेरह, श्रेणिक नृप नीं नार।
चन्दनबाला पै, लीधो संजम भार।।76।।
एक मास संथारे, पहोंती मुक्ति मझार।
ए नवूं जणां नो, अन्तगड़ मां अधिकार।।77।।
श्रेणिक ना बेटा, जालिआदिक तेवीस।
वीर पै व्रत लेई नैं, पाल्यो विश्वावीस।।78।।
तप कठिन करी नैं, पूरी मन जगीश।
देवलोके पहोंता, मोक्ष जासे तज रीस।।79।।
काकंदी नो धन्नो, तजी बत्तीसूं नार।
महावीर समीपे, लीधो संजम भार।।80।।
करी छठ छठ पारण, आबिल उज्झित आहार।
श्री वीर बखाण्यो, धन्य धन्नो अणगार।।81।।
एक मास संधारे, सर्वार्थसिद्ध पहोंत।
महाविदेह क्षेत्र मां, करसे भव नों अन्त।।82।।
धन्ना नीं रीते, हुवा नवूं ही संत।
श्री अनुत्तरोववाई मां, भाख गया भगवंत।।83।।
सुबाहू प्रमुख, पांच-पांच-सौ नार।
तजि वीर पै लीधा, पंच महाव्रत सार।।84।।
चारित्र लेई नैं, पाल्यो निरतिचार।
देवलोके पहोंता, सुखविपाक अधिकार।।85।।
श्रेणिक नां पोत्रा, पौमादिक हुवा दश।
वीर पै व्रत लेई, काढ्यो देही नों कस।।86।।
संजम आराधी, देवलोक मां जई वस।
महाविदेह क्षेत्र मां, मोक्ष जासे लेई जश।।87।।
बलभद्र नां नन्दन, निषधादिक हुवा बार।
तजी पचास अन्तेउर, त्याग दियो संसार।।88।।
सहु नेमि समीपे, चार महाव्रत लीध।
सर्वार्थसिद्ध पहोंता, होसे विदेहे सीध।।89।।
धन्नो नैं सालीभद्र, मुनीसरों नीं जोड़।
नारी रा बन्धन, तत्क्षण न्हाख्या तोड़।।90।।
तज कुटुम्ब कबीलो, धन कंचन नीं कोड़।
मास-मासखमण तप, टालसे भवां नीं खोड़।।91।।
श्री सुधर्म स्वामी नां, शिष्य धन्य जम्बू स्वाम।
तजी आठ अन्तेउर, मातपिता धन धाम।।92।।
प्रभवादिक तारी, पहोंतो शिवपुर ठाम।
सूत्र प्रवर्तावी, जग मां राख्यु नाम।।93।।
धन्य ढंढण मुनिवर, कृष्णराय नां नंद।
शुद्ध अभिग्रह पाली, टाल दियो भव फंद।।94।।
बलि खन्धक ऋषि नीं, देह उतारी खाल।
परीषह सही नैं, भव फेरा दिया टाल।।95।।
बलि खन्धक ऋषि नां, हुआ पांच सौ शीष।
घाणी मां पील्या, मुक्ति गया तज रीस।।96।।
संभूतिविजय शिष्य, भद्रबाहु मुनिराय।
चवदे पूरवधारी, चन्द्रगुप्त आण्यो ठाय।।97।।
बलि आर्द्रकुमार मुनि, स्थूलिभद्र नन्दिषेण।
अरणक अइमुत्तो, मुनीश्वरां री श्रेण।।98।।
चौबीस जिन नां मुनि, संख्या अठावीस लाख।
ऊपर सहस्र अड़तालीस, सूत्र परंपरा भाख।।99।।
कोई उत्तम बांचो, मूंढ़ै जयणा राख।
उघाड़े मुख बोल्या, पाप लागे इम भाख।।100।।
धन्य मरुदेवी माता, ध्यायो निर्मल ध्यान।
गज होदे पायो, निर्मल केवलज्ञान।।101।।
धन्य आदीश्वर नीं, पुत्री ब्राह्मी सुन्दरी दोय।
चारित्र लेई नैं, मुक्ति गयी सिद्ध होय।।102।।
चौबीसे जिन नीं, बड़ी शिष्यणी चौबीस।
सती मुक्ति पहोंती, पूरी मन जगीश।।103।।
चौबीसे जिन नीं, सर्व साधवी सार।
अड़तालीस लाख नैं, आठसौ सितर हजार।।104।।
चेड़ा नीं पुत्री, राखी धर्म सूं प्रीत।
राजीमती विजया, मृगावती सुविनीत।।105।।
पद्मावती मयणरेहा, द्रौपदी दमयन्ती सीत।
इत्यादिक सतियां, गई जमारो जीत।।106।।
चौबीसे जिन नां, साधु साध्वी सार।
गया मोक्ष देवलोके, हृदये राखो धार।।107।।
इण अढीद्वीप मां, गरड़ा तपसी बाल।
पंच महाव्रतधारी, नमो नमो त्रिउं काल।।108।।
ए संत सत्यां नां, लीजे नितप्रति नाम।
शुद्ध मन थी ध्याओ, एह तिरण नों ठाम।।109।।
ए यति सतियां स्यूं, राखो उज्ज्वल भाव।
इम कहै ऋषि जयमल, एह तरण नों दाव।।110।।
संवत अठारै नैं, वर्ष साते सिरदार।
गढ़ जालोर मांही, एह कह्यो अधिकार।।111।।
यह साधुवंदना हमें त्याग, संयम, तप, करुणा और सच्ची श्रद्धा का महत्व समझाती है। महान साधु-साध्वियों का स्मरण मन को पवित्र बनाता है और हमें आत्मकल्याण तथा मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
