यह चालीसा तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु के महान जीवन, त्याग, तप, ज्ञान और धर्म-सुधार कार्यों का सुंदर वर्णन करती है। इसमें उनके जन्म से लेकर संयम, साधना, तेरापंथ की स्थापना और जनकल्याणकारी उपदेशों का सरल भावों में गुणगान किया गया है। रचयिता मुनि कन्हैया ने श्रद्धा और भक्ति के साथ आचार्य भिक्षु की महिमा का गान किया है।
श्री भिक्षु चालीसा - भिक्षु भिक्षु गणपाल की महिमा है सर्वत्र
🎶 लय – चालीसा
✍🏻 रचयिता – मुनि कन्हैया
भिक्षु भिक्षु गणपाल की, महिमा है सर्वत्र।
तेरापंथ समाज के, ज्योतिर्मय नक्षत्र।
इनकी करुणा दृष्टि से, निश्चित बेड़ा पार।
मुनि कन्हैया नित रटो, भिक्षु नाम अविकार।
जय जय जय हे भिक्षु स्वामी।
महावीर पथ के अनुगामी।।
सतरह सौ तिरयांसी आया।
आषाढ़ सुदी तेरस दिन भाया।।
जन्म हुआ गुरुवर का भारी।
पुर कंटालिया में सुखकारी।।
दीपांजी के लाल दुलारे।
बल्लूजी के कुल उजियारे।।
बचपन में भी गौरव पाया।
अद्भुत बुद्धि प्रयोग दिखाया।।
यौवन में वैराग्य जगा है।
संयम लेने मन उमगा है।।
करके शाश्वत सत्य समीक्षा।
पायी भागवती शुभ दीक्षा।।
मोह द्रोह का बंधन तोड़ा।
साम्य साधना में दिल जोड़ा।।
शास्त्राभ्यास किया सुखकारी।
पाई ज्ञान संपदा भारी।।
राजनगर में बोध मिला है।
अन्तर-तम का दुर्ग हिला है।।
आगम मंथन करके पाया।
सत्य तत्त्व नवनीत सुहाया।।
धर्म क्षेत्र में क्रान्ति मचाई।
आत्मिक बल से लड़ी लड़ाई।।
कष्ट अंधेरी ओरी वाला।
घट-घट में भर गया उजाला।।
तेरापथ की नींव लगाई।
जिन शासन महिमा महकाई।।
शिथिलाचार समूल मिटाया।
शुद्ध साधना-पथ अपनाया।।
दान-दया का भेद सिखाया।
व्रत अव्रत का रूप बताया।।
जन-विरोध का भय न सताया।
आगम सम्मत तथ्य सुनाया।।
धन से नहीं धर्म का नाता।
मन को साधे वह सध जाता।।
मर्मबोधिनी सच्ची वाणी।
जन-जन में गूंजी कल्याणी।।
मान विनोद विरोध सहे थे।
आत्म लक्ष्य पर अडिग रहे थे।।
मिला न वर्षों भोजन पूरा।
फिर भी तजा न काम अधूरा।।
नहीं स्थान रहने को पाया।
पर मन सुमन नहीं मुरझाया।।
मरघट में भी वास किया था।
जीत जगत विश्वास लिया था।।
लेते आतापन तपधारी।
प्रति-पद जन जाते बलिहारी।।
समझाने में रात बिताई।
सम्यक दृष्टि सदा सरसाई।।
शिक्षामृत का पान कराया।
लाखों जन को तृप्त बनाया।।
जिनवाणी का शंख बजाया।
जन्म-जन्म का रोग मिटाया।।
एक डोर में संघ चलाया।
प्रेम-भाव का स्रोत बहाया।।
आत्म-समर्पण पाठ पढ़ाया।
जैन धर्म का ध्वज लहराया।।
सिरियारी में रंग लगाया।
सात प्रहर का अनशन आया।।
साठ अठारह सौ सुखदाई।
भाद्रव शुक्ला तेरस आई।।
स्वर्ग पधारे भिक्षु स्वामी।
सन्त शिरोमणि अन्तर्यामी।।
मन्त्र स्वयं प्रभु नाम तुम्हारा।
शरणागत को तारणहारा।।
मंगलकारी जाप तुम्हारा।
मिल जाये भव सिन्धु किनारा।।
पाकर दर्शन जीवन बूंटी।
भक्त ‘शोभ’ की बेड़ी टूटी।।
स्मृति की शाखा सदा हरी है।
पटवोजी ने विजय वरी है।।
भिक्षु भक्ति में दिल को जोड़ा।
टूटा रूपांजी का खोड़ा।।
भिक्षु-नाम उत्तम फल दाता।
भूत प्रेत-भय दूर भगाता।।
चालीसा यह भाग्य विधाता।
जन-जन को देता सुख साता।।
‘मुनि कन्हैया’ बन संस्कारी।
स्थिर मन पाठ करो नर-नारी।।
यह चालीसा हमें सत्य, संयम, समर्पण और आत्म-साधना की प्रेरणा देती है। आचार्य श्री भिक्षु के आदर्श जीवन का स्मरण कर श्रद्धालु धर्ममार्ग पर आगे बढ़ने और आत्मकल्याण का संकल्प लेते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
