तप की ज्योति में तपकर आत्मा बनती है कुन्दन (Tap Ki Jyoti Mein Tapkar Aatma Banti Hai Kundan)

यह गीत तप की महिमा, उसके आध्यात्मिक प्रभाव और आत्मकल्याण के मार्ग को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। साध्वी निर्वाणश्रीजी ने सरल एवं भावपूर्ण शब्दों में बताया है कि तप आत्मा को निर्मल बनाता है, कर्मबंधनों को तोड़ता है और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है। गीत में तपस्वियों के गौरव, परिवार के हर्ष और तप-अनुष्ठान की मंगलमयी प्रेरणा का भी मनोहारी वर्णन किया गया है। 

 

तप की ज्योति में तपकर आत्मा बनती है कुन्दन

🎶 लय – ऐ मेरे वतन के लोगों 

✍🏻 रचयिता – साध्वी निर्वाणश्रीजी

 

तप की ज्योति में तपकर, 

आत्मा बनती है कुन्दन। 

तप की महिमा है भारी, 

तप से टूटे अघ बंधन।।

 

है धर्म निर्जरा संवर, 

मिलती मंजिल मनचाही, 

टूटे बेड़ी कर्मों की, 

मिट जाए भव की त्राही। 

लक्षित मग में गतिमय हो, 

यह मिला तपस्या स्यंदन।।

 

पाए अनुपम गणमाली, 

गणमंदिर अपना पावन, 

तपधारी मुनि-सतियों का, 

तप वर्णन है मनभावन। 

सौभागी हमने पाया, 

देव रमण वन नंदन।।

 

तप अनुष्ठान लख तेरा, 

पुलकित है परिजन सारे, 

कुल पर शुभ कलश चढ़ाया, 

गूंजे चिहुं दिशि तप नारे। 

परिजन मिलकर के करते, 

तेरा मंगल अभिनंदन।।

 

यह प्रेरणादायी तप-गीत हमें तप, संयम और आत्मशुद्धि का महत्व समझाता है। तप से जीवन में पवित्रता, उन्नति और आनंद का संचार होता है। यही इस रचना का सुंदर और सार्थक संदेश है।

🙏जय जिनेंद्र🙏