तप पावन तीरथ कहलाए तप आगे सुर-नर झुक जाए (Tap Paavan Tirath Kehlaye Tap Aage Sur-Nar Jhuk Jaye)

यह मधुर तप-गीत तपस्या की महिमा और उसके दिव्य प्रभाव का सुंदर वर्णन करता है। रचयिता साध्वी यशोधराजी ने सरल शब्दों में बताया है कि तप जीवन को प्रकाशमय बनाता है, मन को निर्मल करता है और इच्छित फल प्रदान करता है। गीत में महान तपस्वियों के उदाहरण देकर तप की प्रेरणा दी गई है। यह रचना आत्मशुद्धि, संस्कारों के विकास और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देती है। 

 

तप पावन तीरथ कहलाए तप आगे सुर-नर झुक जाए

🎶 लय – प्राण-प्राण

✍🏻 रचयिता – साध्वी यशोधराजी

 

तप पावन तीरथ कहलाए, 

तप आगे सुर-नर झुक जाए। 

तप अभिनन्दन कर हरसाएं, 

तप से मनवांछित फल पाएं।।

 

तप ही जीवन ज्योति है, 

तप उजले-उजले मोती हैं। 

तप मानस उपवन सरसाए।।

 

भूरां ने की बारहमासी, 

की झूमां ने छः छः मासी।

अ.भि.रा.शि.को. जपते जाएं।।

 

तप से बनती कंचन काया, 

सुख का सावन है लहराया। 

दुःख दुविधाएं सब टल जाए।।

 

बज रही है तप की वीणा, 

तप सौरभ से कण-कण भीना। 

तप से पावस रंग खिल जाए।।

 

संस्कारों का जब हो शोधन, 

मन को मिलता तबउद्बोधन।

‘यशोधरा’ तप गीत गाए।।

 

यह गीत हमें तप के महत्व को समझाते हुए आत्मसंयम और आत्मविकास की प्रेरणा देता है। तप से जीवन में शांति, पवित्रता और आनंद आता है। यही इस सुंदर रचना का मुख्य संदेश है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏