यह भजन मुनि मधुकरजी की गुरु-विरह से भरी एक मार्मिक रचना है। इसमें आचार्य तुलसी के अचानक महाप्रयाण के बाद उत्पन्न हुए दुःख, आश्चर्य और भाव-विह्वलता को व्यक्त किया गया है। रचयिता बार-बार प्रश्न करता है कि गुरुदेव बिना बताए इतनी जल्दी क्यों चले गए। यह रचना गुरु के प्रति गहरे प्रेम, श्रद्धा और आत्मीय लगाव का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है।
गुरुदेव! अचानक आप म्हांमें आ कांई करी?
🎶 लय – कानूड़ालाल
✍🏻 रचयिता – मुनि मधुकरजी
गुरुदेव!
अचानक आप म्हांमें आ कांई करी?
आ कांई करी, कल्पना रहगी सै धरी।।
चाल्या जद चन्देरी स्यूं सोची घणी बातां,
कियां के करणो चिन्तन चाल्यो कित्ती रातां।
बिच-में क्यूं छोड़ पधारया शासन-प्रहरी!
के होतो पेली थोड़ो बतला दिराता?
कांई जल्दी ऊपर के बंद हूंता खाता?
गुपचुप पधार्या लागी ठेस गहरी।।
तुलसी-महाप्रज्ञ री म्हें निरखी इकतारी,
बिना सला हुई बात आ कियां परबारी?
सुणतां ही दुनियां बणगी गूंगी, बहरी!
लारै बितेली कांई ध्यान दिराता,
महाश्रमणी जी नै भी तो याद कराता।
सूनी-सी होगी नानकियां री नगरी!
‘मधुकर’ चरणाम्बुज में नित मोद मनातो,
अणु-अणु स्यूं मिलती ऊर्जा जद-कद भी जातो।
वत्सलता स्यूं सिंच्योड़ी बिखरी गगरी ।।
यह भजन गुरु-वियोग की वेदना और श्रद्धा का हृदयस्पर्शी स्वर है। गुरुदेव की स्मृतियाँ आज भी प्रेरणा और ऊर्जा देती हैं। उनका स्नेह, मार्गदर्शन और आदर्श सदैव साधकों के जीवन में जीवित रहेंगे।
🙏जय जिनेंद्र🙏
