यह भजन आचार्य तुलसी के महान व्यक्तित्व, आध्यात्मिक नेतृत्व और मानवता के प्रति उनके अमूल्य योगदान का भावपूर्ण गुणगान है। रचयिता ने उन्हें तेरापंथ धर्मसंघ का ध्रुवतारा बताते हुए उनके तेज, करुणा, पराक्रम और दूरदर्शिता का सुंदर चित्रण किया है। भजन में आचार्यश्री के प्रति गहरी श्रद्धा, आत्मीयता और विरह के भाव भी व्यक्त हुए हैं। यह रचना गुरु-भक्ति से ओतप्रोत है।
तुलसी तेरापंथ रो ध्रुवतारो - तुलसी तेरापंथ रै, आकाश रो ध्रुवतारो
🎶 लय – भीखणजी स्वामी रो…
✍🏻 रचयिता – साध्वी कनकश्रीजी
तुलसी तेरापंथ रै, आकाश रो ध्रुवतारो,
फैलायो संसार में, आध्यात्म रो उजारो।
फैलायो उजियारो,
बणग्यो असहायां रो स्हारो।।
ऊर्जस्वल व्यक्तित्व विरल,
बो लाखां में नहीं लाधै।
रूप दियो सूरज-चांदै रो,
जाणै सिरजण हारो।।
बोल-चाल मुळको हो न्यारो,
अंखियां में हो जादू।
महर-नजर टिक ज्याती जिण पर,
बीं-रो सफल जमारो।।
नहीं वृद्ध अनुभव्यो स्वयं ने,
श्रम स्यूं सदा समृद्ध हो।
करुणा गौतम बुद्ध-सी,
मानवता रो रखवारो।।
जिन-शासन नै खूब दिपायो,
कस्यो पराक्रम भारी।
भरत-क्षेत्र में तीर्थंकर सो,
तुलसी रो बरतारो।।
जागृत प्रज्ञा महाप्रज्ञ री,
महाश्रमणी महिमामयी।
युवाचार्य श्री महाश्रमण ने,
घालै सै थुथकारो।।
म्हानै भेज्या दक्षिण में प्रभु,
सहसा स्वर्ग सिधारया।
महाप्रज्ञ महाश्रमणी ने भी,
नहीं पड़यो भणकारो।।
जीवन भर दी ममता,
पल-पल वत्सलता बरसाई।
प्राणदेवता! एक बार तो,
दिखलाद्यो उणिहारो।
महाप्राण गुरुदेव ! ‘कनक’ री,
विनती आ स्वीकारो।।
यह भजन आचार्य तुलसी के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम का सुंदर स्वर है। उनके आदर्शों, करुणा और आध्यात्मिक प्रकाश का स्मरण कर यह रचना भक्तों के हृदय में प्रेरणा और भक्ति जगाती है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
