यह स्तुति प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की महिमा का सुंदर वर्णन करती है। इसमें उनके तप, वैराग्य, समभाव और आत्मकल्याण के मार्ग को सरल शब्दों में बताया गया है। रचयिता आचार्य श्री जीतमलजी ने प्रभु के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर भक्ति और श्रद्धा व्यक्त की है। यह रचना साधक को संसार की आसक्ति छोड़कर आत्मचिंतन, समता और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का संदेश देती है।
तीर्थंकर ऋषभ प्रभु - प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा
🎶 लय – ऐसे गुरु किम पाइयै
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री जीतमलजी (श्रीमद जयाचार्य)
प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं,
जय जय जिन चंदा।
मैं प्रथम अर्हत् को प्रणाम करता हूँ।
हे जिनचन्द्र ! तुम्हारी जय विजय हो।
वन्दू बेकर जोड़ नैं,
जुग आदि जिनिन्दा।
कर्म-रिपु-गज ऊपरै,
मृगराज । मुनिन्दा।।
मैं इस युग के आदि अर्हत् ऋषभदेव को बद्धाञ्जलि होकर वंदना करता हूँ।
हे मुनीन्द्र ! कर्मशत्रु रूप हाथी को आहत करने के लिए तुम सिंह के समान हो।
अनुकूल प्रतिकूल सम सही,
तप विविध तपंदा।
चेतन तन भिन लेखवी,
ध्यान शुकल ध्यावंदा।।
तुमने अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों को समभाव से सहन कर विविध प्रकार का तप तपा।
भेद विज्ञान के द्वारा आत्मा और शरीर को भिन्न समझकर तुम शुक्लध्यान में लीन हो गये।
पुद्गल-सुख अरि पेखिया,
दुख हेतु भयाला।
विरक्त चित विघट्यो इसो,
जाण्या प्रत्यक्ष जाला।।
तुमने देखा यह पौद्गलिक सुख अहितकर, दुःखहेतु और भय पैदा करने वाला है।
उसे प्रत्यक्ष पाश के रूप में समझकर तुम्हारा विरक्त चित्त उससे विलग हो गया।
संवेग-सरवर झूलता,
उपशम-रस लीना।
निंदा-स्तुति सुख-दुःख में,
समभाव सुचीना।।
तुम संवेग रूप सरोवर के शांतरस रूप जल में तल्लीन होकर डुबकियां लगाते रहे।
निन्दा-स्तुति और सुख-दुःख इन द्वन्द्वों में सम रहना ही साधना का पथ है। इस तथ्य को तुमने भली-भांति समझ लिया।
वासी चंदन समपणैं,
थिर-चित्त जिन ध्याया।
इम तन-सार तजी करी,
प्रभु केवल पाया।।
तुम बसौले से काटने और चंदन से चर्चित करने पर समचित्त रहे।
तुमने स्थिर-चित्त होकर ध्यान किया।
इस प्रकार देहाध्यास को छोड़ तुम केवली बन गये।
हूं बलिहारी तांहरी,
वाह! वाह! जिनराया।
उवा दिशा किण दिन आवसी,
मुझ मन ऊम्हाया।।
उगणीसै सुदि भाद्रवै,
दशमी दीतवारं।
ऋषभदेव रटवै करी,
हुओ हरष अपारं।।
हे जिनेश्वर ! मैं तुम्हारे लिए उपहत हूँ।
उस स्थिति को मैं किस दिन प्राप्त कर सकूंगा?
मेरा मन उतावला हो रहा है।
अर्हत् ऋषभ! तुम्हारी स्तुति करने से मुझे अपार हर्ष हुआ।
यह भजन हमें सिखाता है कि सच्चा पंथ भीतर से शुरू होता है। जब हम समर्पण, विनय और संतुलन अपनाते हैं, तब जीवन में शतदल कमल खिलता है और आत्मा को शांति मिलती है। सही मार्ग का प्रकाश फैलता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
