तप रै झूले में झूल्यां आनंद आवै है (Tap Re Jhule Mein Jhulya Anand Aave Hai)

यह भजन तप की महिमा, उसके आनंद और आत्मकल्याणकारी प्रभाव का सुंदर वर्णन करता है। साध्वी कनकश्रीजी ने इसमें बताया है कि तप केवल कष्ट सहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा को प्रसन्नता और शक्ति देने वाला साधन है। भजन में तीर्थंकरों, आचार्यों और महान तपस्वियों का स्मरण करते हुए साधकों को संयम, समता और मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई है। 

 

तप रै झूले में झूल्यां आनंद आवै है

🎶 लय – तुलसी चरणां में

✍🏻 रचयिता – साध्वी कनकश्रीजी

 

तप रै झूले में, झूल्यां आनंद आवै है, 

आनंद आवै है, 

कि झूल्यां आनंद आवै है। 

आनंद आवै है, 

कि मन म्हांरो मोद मनावै है।।

 

ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन, 

सुमति, पद्म सुखकारी रे, 

श्री सुपार्श्व, चंदाप्रभु, सुविधि, 

शीतलप्रभु भयहारी रे। 

श्री श्रेयांस, वासुपूज्य जिन, 

जन-जन ध्यावै है।। 

 

विमल, अनंत, धर्म जिनवर, 

श्री शांति, कुंथु उपकारी रे, 

अर्हत अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, 

नमि जिन महिमा न्यारी रे। 

नेमी, पारस, वीर चरण में, 

शीष झुकावै है।।

 

आर्य भिक्षु, श्रीभारमल्ल, ऋषिराय, 

जीत जयकारी रे, 

मघवा, माणक, डालगणी, 

कालू विभुता धारी रे। 

तुलसी, महाप्रज्ञ जिनशासन, 

जबर दिपावै है।।

 

अमृत, कोदर, भीम, रामसुख, 

शिवमुनि महा तपस्वी रे, 

महासती अणचां, पन्ना रो, 

जीवन बड़ो यशस्वी रे। 

आंरो सुमिरण भी कण-कण में, 

जोश जगावै है।।

 

तपो-योग स्यूं साधक देखो, 

संयम समता साधै रे। 

कष्ट सहन में प्रबल मनोबल, 

मोक्ष मार्ग आराधै रे। 

भजन मंडली गीत सुणाकर, 

भाव बढ़ावै है।। 

 

इस भजन का संदेश है कि तप, संयम और साधना से जीवन में सच्चा आनंद प्राप्त होता है। महापुरुषों के आदर्शों का अनुसरण कर साधक आत्मिक उन्नति करता है और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏