तीर्थंकर महावीर – समता के दीप जला गये जी (Tirthankar Mahavir – Samta Ke Deep Jala Gaye Ji)

यह भजन भगवान महावीर स्वामी के समता, मैत्री, संयम और अहिंसा के संदेश को सरल शब्दों में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि सभी जीव समान हैं और प्रेम, साहस तथा मधुर व्यवहार से जीवन सुंदर बनता है। रचयिता श्री मुनि वत्सराजजी ने इस भजन के माध्यम से मानवता, आत्मचिंतन और समरसता का सुंदर संदेश दिया है। यह भजन मन में शांति और सद्भाव जगाता है। 

 

तीर्थंकर महावीर - समता के दीप जला गये जी

🎶 लय – ओ म्हांरा गुरुदेव

✍🏻 रचयिता – श्री मुनि वत्सराजजी 

 

समता के दीप जला गये जी, 

तीर्थंकर महावीर। 

संयम के गीत सुना गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

सब अपने प्यारे भाई, 

मत खोदो पथ में खाई। 

मैत्री का मार्ग बना गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

सब फूल एक ही वन के, 

सब दीप एक आंगन के। 

सब में समदृष्टि जगा गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

सब एक गगन के तारे, 

भू मां के लाल दुलारे। 

समरस की सृष्टि सजा गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

सुख दुःख जीवन के साथी, 

मत बुझने दो मन बाती। 

साहस का सबक सिखा गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

है ग्रंथ अनेक जगत में, 

है पंथ अनेक जगत में। 

पर मंजिल एक बता गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

कथनी-करनी समरस हो, 

बाहर भीतर मधुरस हो। 

ऋजुता की राह दिखा गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।।

 

खाने-पीने में समता, 

मरने जीने में समता। 

आत्मा में लगन लगा गये जी, 

तीर्थंकर महावीर।। 

 

यह भजन हमें समता, प्रेम, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है। भगवान महावीर का संदेश आज भी जीवन को सही दिशा देने वाली अमूल्य प्रेरणा है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏