यह स्वरूप चिन्तन आत्म-जागरण और आत्म-शुद्धि का मधुर गीत है। इसमें मनुष्य को अपने भीतर झांकने, आत्मा को पहचानने और भ्रम से बाहर आने की प्रेरणा दी गई है। गीत बताता है कि शरीर और मन ही सब कुछ नहीं हैं, बल्कि आत्मा ही हमारा सच्चा स्वरूप है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने सरल शब्दों में वर्तमान में जीने, ज्ञान व आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का संदेश दिया है।
स्वरूप चिन्तन - आएं आएं हम आएं अपने घर भीतर आएं
🎶 लय – इठलाना सब ही छोड़ो
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
आएं-आएं हम आएं,
अपने घर भीतर आएं।
अपने घर भीतर आकर,
हम सदा सुखी बन जाएं।।
मैं समझ रहा था तन को,
यह मेरा अपना घर है,
मैं समझ रहा था मन को,
यह मेरा ही अनुचर है।
पर टूट गया भ्रम मेरा,
जीवन में ज्योति जगाएं।।
यह तन है पावन नौका,
इससे भव-जल तरना है,
यह नाविक मेरी आत्मा,
इससे उद्यम करना है।
प्रतिकूल हवा को अब हम,
अपने अनुकूल बनाएं।।
मैं कौन कहां से आया?
है और कहां पर जाना?
क्या है मेरा अपना वह?
मैंने न जिसे पहचाना।
हम भूत और भावी से,
अब वर्तमान में आएं।।
यह भूख-प्यास की पीड़ा,
अब मुझको नहीं सताती,
मैं केवल ज्ञाता द्रष्टा,
यह जलती चिन्मय बाती।
संवेदन की भूमी से,
ऊपर अब हम उठ जाएं।।
मैं मुक्त मृत्यु के भय से,
ना मुझको व्याधि सताती,
ना कष्ट मुझे अब छूते,
चेतन धारा लहराती।
अपना हित अपने द्वारा,
यह मंत्र सतत दोहराएं।।
नाणं सरणं सरणं मे,
सन्नाणं सरणं सरणं,
दंसण सरणं सरणं मे,
सद्-दंसण सरणं सरणं।
तप संयम सरणं सरणं,
शरणागत हम बन जाएं।।
सरणं भगवं श्री वीरो,
सरणं श्री गुरुवर सरणं,
सरणं मम निर्मल आत्मा,
सरणं रत्नत्रय सरणं।
अत्राण रहे हम अब तक,
अब त्राण स्वयं बन जाएं।।
यह गीत आत्मचिंतन, शांति और आत्मविश्वास का सुंदर संदेश देता है। यह हमें भीतर की शक्ति पहचानकर वर्तमान में जीने और आत्मा की शरण में रहकर सच्चा सुख पाने की प्रेरणा देता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
