संयममय जीवन हो – नैतिकता की सुर-सरिता में (Sanyam May Jivan Ho – Naitikta Ki Sur Sarita Mein)

यह रचना आचार्य तुलसी द्वारा लिखी गई एक प्रेरणादायक कविता है। इसमें संयम, नैतिकता और आत्म-अनुशासन का महत्व बताया गया है। कवि सरल जीवन, अच्छे विचार और छोटे-छोटे संकल्पों से बड़े परिवर्तन की बात करते हैं। यह कविता हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति अपने आचरण को सुधारकर समाज और देश को बेहतर बना सकता है।

 

संयममय जीवन हो - नैतिकता की सुर-सरिता में

🎶 लय – चैत्य पुरुष जग जाए

✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी 

 

संयममय जीवन हो 

नैतिकता की सुर-सरिता में, 

जन-जन मन पावन हो।।

 

अपने से अपना अनुशासन, 

अणुव्रत की परिभाषा, 

वर्ण, जाति या सम्प्रदाय से, 

मुक्त धर्म की भाषा। 

छोटे-छोटे संकल्पों से, 

मानस परिवर्तन हो।।

 

मैत्री-भाव हमारा सबसे, 

प्रतिदिन बढ़ता जाए, 

समता-सह-अस्तित्व, 

समन्वय नीति सफलता पाए। 

शुद्ध साध्य के लिए नियोजित, 

मात्र शुद्ध साधन हो।।

 

विद्यार्थी या शिक्षक हो, 

मजदूर और व्यापारी, 

नर हो नारी, बने नीतिमय, 

जीवनचर्या सारी। 

कथनी-करनी की समानता, 

में गतिशील चरण हो।।

 

प्रभु बनकर के ही हम प्रभु की, 

पूजा कर सकते हैं, 

प्रामाणिक बनकर ही, 

संकट सागर तर सकते हैं। 

आज अहिंसा शौर्य-वीर्य, 

संयुत जीवन-दर्शन हो।।

 

सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, 

राष्ट्र स्वयं सुधरेगा, 

‘तुलसी’ अणुव्रत सिंहनाद, 

सारे जग में प्रसरेगा। 

मानवीय आचार-संहिता, 

में अर्पित तन-मन हो।।

 

यह कविता हमें अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है। यदि हम अपने जीवन में संयम, सत्य और नैतिकता अपनाएं, तो समाज और देश दोनों बेहतर बन सकते हैं।

🙏जय जिनेंद्र🙏