छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो? (Chhodo Kyun Koni Krodh Ro Nasho?)

यह भजन आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित है, जिसमें क्रोध के दोष को बहुत सरल और प्रभावशाली शब्दों में समझाया गया है। इसमें बताया गया है कि क्रोध मनुष्य को अंदर से कमजोर बनाता है और उसके अच्छे गुणों को नष्ट कर देता है। क्रोध के कारण व्यक्ति अपने व्यवहार पर नियंत्रण खो देता है और दूसरों को कष्ट पहुंचाता है। 

 

छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो?

🎶 लय – मंदिर में कांई ढूंढती फिरै

✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी 

 

छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो?

थांरी आंख्यां में लोही रो उफाण।

छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो? 

धांरी अक-बक बकणै री पड़गी बाण ।

दूजां नै काळे नाग ज्यूं डसो ।।

 

क्रोध बड़ो दुर्गुण दुनियां में, 

घट-घट में बसनारो। 

जिण घट में नहिं क्रोध निवासी, 

वो नर जगत सितारो ।।

 

पंचेन्द्रिय प्राणी री यद्यपि, 

करै न कतल विचारो। 

तदपि कषायी नाम कुपित रो, 

आगम-वचन निहारो।।

 

प्रेम परस्पर दर पीढ्यां रो, 

शिष्टाचार सदा रो। 

खिण भर में तिणखै ज्यूं तोड़ै, 

बोल वचन मुख खारो।।

 

गाली सुण्यां न हुवै गूमड़ा, 

छिदै न अवयव थांरो। 

थे जो सहस्यो समभावां स्यूं, 

तो बो पिछतावणहारो।।

 

गाळीवान कठै स्यूं ल्यासी, 

मांग मधुर वच प्यारो। 

थे तो मृदुल मनोहरभाषी, 

अपणो विरुद विचारो।।

 

जठै क्रोध है, 

अहंकार री नियमा तजै न लारो। 

सुण दृष्टान्त ‘सन्त धोबी रो’, 

मन री रीस उतारो।।

 

विफल कियो ‘कुल-पुत्र’ रोष ज्यूं, 

झट बारह वर्षां रो। 

त्यूं प्रशांत उपशांत भाव स्यूं, 

‘तुलसी’ सफल जमारो।।

 

इस भजन से हमें सीख मिलती है कि क्रोध को छोड़कर शांति और मधुर वाणी अपनानी चाहिए। इससे हमारा जीवन सुखी बनता है और संबंध मजबूत होते हैं। संयम ही सच्ची सफलता का मार्ग है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏