उगी सुनहली भोर णमो गुरुदेवाणं (Ugi Sunhali Bhor Namo Gurudevanam)

यह भजन “उगी सुनहली भोर णमो गुरुदेवाणं” बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना है। इसकी रचयिता साध्वी सिद्धप्रज्ञा जी हैं। इसमें गुरु के प्रति श्रद्धा, भक्ति और तेरापंथ की महान परंपरा का वर्णन किया गया है। भजन में आचार्य भिक्षु की अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और धर्म-क्रांति का संदेश सरल शब्दों में दिया गया है। इसे गाने से जीवन में सही दिशा अपनाने की प्रेरणा मिलती है। 

 

उगी सुनहली भोर णमो गुरुदेवाणं

🎶 लय – श्रद्धा विनय समेत णमो अरहंताणं

✍🏻 रचयिता – साध्वी सिद्धप्रज्ञा जी  

 

उगी सुनहली भोर, णमो गुरुदेवाणं। 

प्रमुदित है हर पोर, णमो आयरियाणं।।

 

तेरापंथ के भाग्य निराले, 

एक-एक से बढ़कर आले। 

भैक्षवगण सिरमौर।।

 

आर्य भिक्षु की अभिनव शैली, 

ना कोई अपना चेला चेली। 

अनुशासन की डोर।। 

 

धर्म-क्रांति की उज्जवल धारा, 

युग-मानव को मिले किनारा। 

वरदायी हर मोड़।।

 

दिव्य भव्य व्यक्तित्व निखारा, 

सहज समर्पण प्रज्ञा द्वारा।

चिंतन नया नकोर।।

 

नियति भाग्य पुरुषार्थ-त्रयी तुम, 

प्रज्ञा से पग-पग विजयी तुम। 

‘तुलसी’ दिल की कौर।।

 

यह भजन हमें गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण बढ़ाने की प्रेरणा देता है। साध्वी सिद्धप्रज्ञा जी की यह रचना सरल और प्रभावी है। इसे भाव से गाने पर मन प्रसन्न होता है और जीवन में शांति आती है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏