यह भजन “भिक्षु स्वामी जी जगत में नामी जी” जैन तेरापंथ के प्रथम आचार्य आचार्य भिक्षु के जीवन, त्याग और धर्मक्रांति का भावपूर्ण स्मरण कराता है। इसकी रचना साध्वी कनकश्री जी ने की है। भजन में आचार्य भिक्षु के जन्म, गुरु से मिलन, सत्य के स्वीकार और धर्म के प्रसार का सुंदर वर्णन मिलता है। यह भजन हमें आचार्य भिक्षु के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है।
भिक्षु स्वामी जी जगत में नामी जी
🎶 लय – लड़ली लूमा झूमा ए
✍🏻 रचयिता – साध्वी कनकश्री जी
भिक्षु स्वामी जी, जगत में नामी जी,
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में,
हो स्वामी!
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में।।
कंटालियो कश्मीर बण्यो,
या मरु रो मान सरोवर,
राजहंस सो बालक भीखण,
जन्म लियो ज्योतिर्धर।
चुगसी मोती जी,
देसी ज्योति जी,
चुगसी आगम मोती जी,
देसी जग नै ज्योति जी।
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में।।
राजसमंद अमंद उमंगा,
खिल्यो बोधि मंदार,
ताव चढ्यो संताप मिट्यो,
कर लियो सत्य स्वीकार।
मिल्या गुरु चेला जी,
मिट्या झमेला जी,
मिलग्या जद गुरु चेला जी,
मिटग्या सहज झमेलाजी।
शक्ति संचारो म्हांरै तन-मन में।।
सुघरी री छतस्यां स्यूं,
धर्म क्रांति रो बिगुल बजायो,
केलवे अंधारी ओरी,
पहलो पावस ठायो।
परीषह झेल्या जी,
मौत स्यूं खेल्या जी,
परीषह भारी झेल्या जी,
आर्य मौत स्यूं खेल्या जी।
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में।।
चम्मालीस बरस तक सींची,
शासण री फुलवारी,
सात सुहाणा चौमासा,
निर्वाणोत्सव सिरियारी।
तीरथ प्यारो जी,
जग में न्यारो जी,
तीरथ प्यारो-प्यारो जी,
जग में सब स्यूं न्यारो जी।
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में।।
पावन पांच तीर्थ में मुखरित,
‘कनक’ भिक्षु इतिहास,
आं’रै कण-कण स्यूं महकै है,
त्याग-विराग सुवास।
गौरव गावां जी,
वैभव पावां जी,
गण रो गौरव गावां जी,
आत्मिक वैभव पावां जी।
शक्ति संचारो म्हारै तन-मन में।।
यह भजन आचार्य भिक्षु के त्याग, तप और धर्मकार्य की महिमा को दर्शाता है। इसे गाते समय मन में भक्ति, श्रद्धा और प्रेरणा का भाव जागता है, जिससे आत्मिक शक्ति और धर्म के प्रति समर्पण बढ़ता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
