भज मन भिखू-स्याम, भिखू-स्याम विघ्‍न हरै (Bhaj Man Bhikhu Shyam, Bhikhu Shyam Vighn Hare)

यह भजन आत्ममार्ग की सच्ची खोज को प्रकट करता है। इसमें साधक स्वामी से सही पंथ दिखाने की प्रार्थना करता है। रचना में समर्पण, सहनशीलता, विनय और संतुलन जैसे गुणों का महत्व बताया गया है। संतों की वाणी को कमल के खिलने से तुलना की गई है, जो आंतरिक जागृति का प्रतीक है। यह भजन हमें अपने अहं को छोड़कर सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। 

 

भज मन भिखू-स्याम, भिखू-स्याम विघ्‍न हरै

🎶 लय – फूल्यो फल्यो फिर 

 

भज मन भिखू-स्याम, भिखू-स्याम,

विघ्‍न हरै, आनन्द करै,

सांवरियै रै मंगल शरणै, 

परबारा सै काम सरै।

 

भज मन भिखू-स्याम, भिखू-स्याम,

नांव लियां दु:ख दूर टरै।।

 

कलजुग रो ओ कल्पवृक्ष है, 

ठंडी छांह सनूरी, अरे हां

चिन्तामणि-कामित फलदाता, 

राख आसथा पूरी, अरे हां।

ओ अचूक अनुभूत मंत्र है, 

बिगड़ी गति मति स्थिति सुधरै।।

 

रोग शोक में दु:ख-विजोग में, 

चित्त पर चोट करारी, लागज्या

डाकण-शाकण, भूत-प्रेत जब, 

लगै न कोई कारी, आरे हां।

चढज्या ज्योत, छोत झट उतरै, 

जो बाबलियै नै सिंवरै।।

 

नो-व्यंजन, स्वर मिलकर, 

‘भिखू-स्याम’ नाम निर्मायो,

कुण जाणै किण पुल में, 

दीपां मां ओ नांव कढायो।

तंत्र योग में, गणित शास्त्र में, 

नो को आंक अखंडित रै।।

 

सहजयोग ऊर्जा-प्रयोग में, 

तन छोड़यो सिरियारी, स्वामजी!,

आज समाधी-स्थल पर घूमै, 

तेज वलय जयकारी, अरै।

चिन्ता चूरै, आशा पूरै, 

ऋद्धि-सिद्धि भंडार भरै।।

 

नाम स्वाम रो ले हिन्दुजी, 

करी आंख री कारी, हेमरी,

तपसी भागचंद सरीखा, 

नैया पार उतारी, संघ में।

ओ ‘मदरास जागरण’, 

सागर परिषद्‌’ देख्यां हियो ठरै।।

 

यह भजन हमें सिखाता है कि प्रभु का नाम ही सबसे बड़ा आधार है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास से लिया गया नाम जीवन के कष्ट दूर कर देता है और मन को आनंद से भर देता है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏