यह भावपूर्ण भजन मुनि मोहनलाल जी (आमेट) द्वारा रचित है। इसमें स्वामीजी के प्रति गहरी श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम प्रकट किया गया है। रचना में उनके आदर्श, मर्यादा, त्याग और वाणी की महिमा का सुंदर वर्णन है। कवि ने सरल शब्दों में बताया है कि स्वामीजी ने संघ को दिशा दी, धर्म की ज्योति जगाई और आत्म-दर्शन का मार्ग दिखाया। यह भजन भक्ति और प्रेरणा से भरपूर है।
स्वामीजी! एकर तो देखो पाछा आयनै
🎶 लय – मोरियो आछो बोल्यो रे
✍🏻 रचयिता – मुनि मोहनलाल जी (आमेट)
स्वामीजी! एकर तो देखो पाछा आयनै।
आप उगायोड़ो बड़, पसरयो च्यारूं कूंट।।
स्वामीजी!
इण री छाया में तीरथ च्यार ही।
पीसी योगक्षेम बरस में इमरत घूंट।।
स्वामीजी!
मोछब ओ मर्यादा रो आपरो।
राखै गुरु चेलां नै, बांध्या रेशम डोर।।
स्वामीजी!
माइल हजारां ठरती ठंड में।
इण री नेहां आवै, उड़ता कोयल मोर।।
स्वामीजी!
मोती तुलीज्या आपरी ताकड़ी।
बोल्या सदी अठारवीं, फिर पाछा महावीर।।
स्वामीजी!
नावां हजारां ही मझधार में।
सब बीज झबक्के, आप पुगाई तीर।।
स्वामीजी!
आपरी ही वाणी गांधी बोलिया।
पत्ती चार तोड़, दरखत स्यूं माफी मांग।।
स्वामीजी!
धुंधलो जिण शासण आप उजाळियो।
सत रै खातिर सुख नै, दियो शूली पर टांग।।
स्वामीजी!
खेलण हर पुतली खुल्ली छोड़ दी।
राखी डोर सभी री, एक खिलाड़ी हाथ।।
स्वामीजी!
गुरु नै बणाया पूरा बादशाह।
पण हर चेलै री, मुगती है बांरै माथ।।
स्वामीजी!
गण नै गणी नै दियो मोल है।
पण सब बंधियोड़ा है, आगम रै बंधाण।।
स्वामीजी!
बिरला हुया नै बिरला होवसी।
आतम-दर्शन री यूं, कीधी उण्डी छाण।।
स्वामीजी!
तेरह में सात गया नै छ: रह्या।
पण हो मतो आपरो, राख्यो असल उसूल।।
स्वामीजी!
करियो बिलोणो इत्तो सांवठो।
माखण महावीर, वाणी रो काढ़ण मूल।।
स्वामीजी!
जोड़ी तो जलमी भी.भा. आपरी।
पाछी बण कर, तुलसी महाप्रज्ञ बेजोड़।।
स्वामीजी!
चूहा बिल्ली नै बिल में बाड़िया।
औ तो बिठा आपनै, दिया अरस्तू ठोड़।।
स्वामीजी!
शरणै म्हें आया आपरै संघ रै।
आख्यां आंसू झरता, मात-तात छिटकाय।।
स्वामीजी!
सब कुछ दीज्यो पर दीज्यो साधना।
म्हारै दिवलै री लौ, सूरज स्यूं मिल जाय।
म्हांरै दिवलै री लौ, सूरजमय बण जाय।।
यह भजन हमें स्वामीजी के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है। उनकी वाणी और साधना से जीवन प्रकाशित हो सकता है। हमें भी सत्य, मर्यादा और आत्म-कल्याण का मार्ग अपनाना चाहिए।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
