यह भावपूर्ण स्तुति मुनि मधुकर जी द्वारा रचित है। इसमें शिष्य का अपने पूज्य स्वामीजी के प्रति गहरा प्रेम, श्रद्धा और विरह व्यक्त हुआ है। भक्त अपने गुरु के दर्शन के लिए व्याकुल है और उन्हें अपने नेत्रों में बसाने की विनती करता है। भजन में गुरु की तपस्या, त्याग और जिनवाणी के प्रति उनकी अटल निष्ठा का सुंदर वर्णन है। यह रचना भक्ति, समर्पण और आत्मिक जुड़ाव का मधुर उदाहरण है।
स्वामीजी! आवो देखल्यो, नैणां में तसवीर
🎶 लय – सारंगा तेरी याद में
✍🏻 रचयिता – मुनि मधुकर जी
स्वामीजी! आवो देखल्यो,
नैणां में तसवीर।
तरस रहया म्है दरस बिना,
मछल्यां ज्यूं बिन नीर।।
पल-पल जोवै बावरी,
पलकां थांरी बाट,
मिलणो चावै मोद स्यूं,
बंधन सारा काट।
दिखलाद्यो प्रभु वेग स्यूं,
अपणो रूप विराट।।
कलजुग में भी थे लिख्या,
सतजुग का सा लेख,
काजल सी काळी घटा में,
है बिजली री रेख।
सुंदर सुवरण थाळ स्यूं,
काढ़ी पीतळ मेख।।
मधरी-मधरी चाल स्यूं,
पहुंच्या शिखरां पार,
पगले पगले पर मिल्या,
धगधगता अंगार।
तूफानां में भी बढ़या,
ले हाथां पतवार।।
सरदी गरमी तावड़ो,
गिणता कद बरसात,
समझावण नै गाळता,
आखी आखी रात।
कष्ट सह्या पिण राखली,
जिनवाणी री बात।।
आज उतारां आरती ओ!
हिवड़ै रा हार,
तन-मन स्यूं अरपण करां,
श्रद्धा रो उपहार।
मानो-मानो देवते!
‘मधुकर’री मनुहार।।
यह भजन गुरु भक्ति और समर्पण की सुंदर अभिव्यक्ति है। इसमें प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता के भाव झलकते हैं। अंत में भक्त हृदय से आरती उतारकर अपना सर्वस्व अर्पित करता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
