ओ सिरियारी के संत! निसर्ग महन्त! (O Siriyari Ke Sant! Nisarg Mahant!)

यह भक्ति-गीत आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित है। इसमें सिरियारी के संत के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त किया गया है। कवि ने उनके तप, समता, ध्यान और ज्ञान की महिमा का सरल शब्दों में वर्णन किया है। गीत में गुरु के आध्यात्मिक अनुभव और जिनवाणी के संदेश की झलक मिलती है। यह रचना संत के दिव्य व्यक्तित्व और उनके पुरुषार्थ को स्मरण करने का सुंदर प्रयास है।

 

ओ सिरियारी के संत! निसर्ग महन्त!

🎶 लय – जीवन को सफल बनाऊं

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ 

 

ओ सिरियारी के संत! 

निसर्ग महन्त! छत्र की छाया,

तुमने दुर्लभ को पाया।।

ओ सिरियारी के संत! 

सदैव बसन्त! प्रकृति ने गाया।।

तुमने दुर्लभ को पाया।।

 

तुमने दुर्लभ को प्राप्त किया, 

हमने भी उसका स्वाद लिया।

श्री जिनवाणी संवाद याद है आया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

तुमने जो देखा रेखा है, 

उसमें शाश्‍वत का लेखा है।

जीवन पोथी के हर पन्ने पर छाया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

तप में जप जप में तप तोला, 

समता का सागर अनबोला।

सुनने वाला युग साक्षी है हर्षाया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

तुम ज्ञानी थे या ध्यानी थे, 

तुम ध्यानी थे या ज्ञानी थे।

यह दूध और मिस्री की युति में पाया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

जिनमुद्रा स्मृति में क्यों आई? 

पद्मासन मुद्रा गहराई।

प्रतिबोध भाव की भाषा में बतलाया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

तुम ज्यों ज्यों हुए पुरातन हो, 

अचरज है त्यों त्यों नूतन हो।

जय तुलसी का पुरुषार्थ फला मनभाया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

है अन्तर्मन की जिज्ञासा, 

पीयूष पान क्यों मन प्यासा।

‘महाप्रज्ञ’ स्वयं मति कृति से भावित काया।। 

तुमने दुर्लभ….

 

यह गीत संत के आदर्श जीवन और उनके तप की महिमा को उजागर करता है। उनके विचार आज भी मन को प्रेरणा और शांति देते हैं। गुरु का स्मरण जीवन को सही दिशा देता है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏