यह भक्ति गीत आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित एक भावपूर्ण रचना है। इसमें शासन के आधार, अनुशासन, मर्यादा और गुरु-भक्ति का सुंदर वर्णन किया गया है। कवि ने भिक्षुवर के दिव्य व्यक्तित्व और उनके आध्यात्मिक प्रभाव को श्रद्धा के साथ व्यक्त किया है। इस गीत में धर्म, दया, करुणा और अणु-प्रेक्षा जैसे श्रेष्ठ संस्कारों का संदेश दिया गया है।
देवते! बतलाओ
🎶 लय – आपणै भागां री
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ
देवते! बतलाओ, शासन का आधार,
भिक्षुवर! कैसे तुम बन पाए अवतार,
रोम रोम में रम रहे हो,
बनकर एकाकार।।
अनुशासन ही बन रहा है,
शासन का आधार।
मर्यादा को सिर चढ़ाकर,
बन जाता अवतार।।
तेला भारीमाल का है,
एक नया संसार।
चौमासी दीपां सती की,
एक नया उपहार।।
आज नहीं है हेम मुनिवर,
प्रभु के व्याख्याकर।
जयाचार्य भी है नहीं,
प्रभु भाष्यकार श्रृंगाार।।
आर्यप्रवर तुलसी मुनीश्वर,
भक्त हृदय के हार।
जिनकी मेधा ने दिया है,
तुमको नव आकार।।
मैने समझा है तुम्हें यह,
तुलसी का उपकार।
मेरे गुरु का मानता हूं,
पल-पल मैं आभार।।
इन्द्रियवादी चौपाई में,
तव दर्शन साकार।
नव पदार्थ की चौपाई में,
खुला मुक्ति का द्वार।।
अनुकंपा की चौपाई का,
धर्म और व्यवहार।
विश्लेषण बतला रहा है,
दया धर्म का सार।।
कालू करुणा से जुड़ा है,
मुनि पृथ्वी का तार।
श्रद्धाभूमि से जुड़ा है,
भैरूं का परिवार।।
श्रद्धाभूमि से जुड़ा है,
ईसर का परिवार।
गंगा का गंगाशहर है,
पावस पा गुलजार।।
जन-जन में जागृत रहे नित,
अणु-प्रेक्षा संस्कार।
‘महाप्रज्ञ’ गण में करो प्रभु,
भक्ति-शक्ति संचार।।
यह गीत हमें अनुशासन, श्रद्धा और भक्ति का महत्व समझाता है। गुरु के उपकार को स्मरण करते हुए धर्म और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। ऐसी रचनाएँ जीवन को दिशा और प्रकाश प्रदान करती हैं।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
