चैत्य पुरुष जग जाए (Chaitya Purush Jag Jaye)

यह भक्ति-गीत “चैत्य पुरुष जग जाए” आत्म-जागरण और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर संदेश देता है। इसमें भगवान के पवित्र नाम और मंत्रों की महिमा का वर्णन है। यह रचना हमें आत्मा की शुद्धता, शांति और समता का मार्ग दिखाती है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित यह गीत श्रद्धा, विश्वास और साधना की भावना से भरपूर है। 

 

चैत्य पुरुष जग जाए

🎶 लय – नैतिकता की सुर सरिता में

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ 

 

चैत्य पुरुष जग जाए।

देव! तुम्हारा पुण्य नाम, 

मेरे मन में रम जाए।।

 

ॐ ॐ ॐ, ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ, 

ॐ ॐ ॐ उद्गाता,

अर्हं अर्हं अर्हं अर्हं, 

अर्हं अर्हं त्राता।

ॐ ह्रीं श्रीं जय, ॐ ह्रीं श्रीं जय, 

विजय ध्वजा लहराए।।

 

ॐ जय भिक्षु, भिक्षु जय ॐ, 

ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं,

विघ्‍न शमन ॐ व्याधि शमन ॐ, 

क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं।

नाम मंत्र तव व्रण-संरोहण, 

सतत अमृत बरसाए।।

 

मिटे विषमता तन की, मन की, 

अनुभव की, चिन्तन की,

पल-पल, पग-पग मिले सफलता, 

तन्मयता चेतन की।

नाम मंत्र तव भयहर विषहर, 

साम्य सिन्धु गहराए।।

 

आत्मा भिन्न शरीर भिन्न है, 

तुमने मंत्र पढ़ाया,

आत्मा अचल अरुज शिव शाश्‍वत, 

नश्‍वर है यह काया।

आत्मा आत्मा के द्वारा ही, 

आत्मा में लय पाए।।

 

तुम निरुपद्रव, हम निरुपद्रव, 

तुम हम सब हैं आत्मा,

तव जागृत आत्मा से हम सब, 

बन जाएं परमात्मा।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रं ह्र:, 

अन्तर-मल धुल जाए।।

 

यह गीत हमें आत्मा की शक्ति और नाम-मंत्र की महिमा का स्मरण कराता है। इसके माध्यम से मन शुद्ध होता है और भय दूर होता है। सचमुच, यह रचना आत्म-जागरण और शांति की प्रेरणा देती है।  

🙏 जय जिनेंद्र 🙏