यह “संघ गीत” जैन धर्म के पवित्र तेरापंथ धर्मसंघ की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। इसमें संघ की एकता, अनुशासन, मर्यादा और गुरु-भक्ति की भावना प्रकट होती है। गीत में संघपति के प्रति अटूट प्रेम और दृढ़ संगठन का संदेश दिया गया है। यह रचना हमें संघ की शक्ति, प्रगति और आदर्शों को याद दिलाती है। आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित यह गीत श्रद्धा, विनय और मंगल भाव से भरपूर है।
संघ गीत - जय जय धर्म संघ अविचल हो
🎶 लय – अमर रहेगा धर्म हमारा
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
जय-जय धर्म-संघ अविचल हो।
संघ संघपति प्रेम अटल हो।।
हम सबका सौभाग्य खिला है,
प्रभु यह तेरापंथ मिला है।
एक सुगुरु के अनुशासन में,
एकाचार विचार विमल हो।।
दृढ़तर सुन्दर संघ-संगठन,
क्षीर-नीर-सा यह एकीपन।
है अक्षुण्ण संघ-मर्यादा,
विनय और वात्सल्य अचल हो।।
संघ-संपदा बढ़ती जाए,
प्रगति-शिखर पर चढ़ती जाए।
भैक्षव शासन नन्दनवन की,
सौरभ से सुरभित भूतल हो।।
‘तुलसी’ जय हो सदा विजय हो,
संघ चतुष्ट्य बल अक्षय हो।
श्रद्धा-भक्ति बहे नस-नस में,
पग-पग पर प्रतिपल मंगल हो।।
यह गीत हमें धर्मसंघ के प्रति समर्पण, एकता और भक्ति की प्रेरणा देता है। इसके शब्द हमारे मन में श्रद्धा जगाते हैं और संघ की मर्यादा को बनाए रखने का संदेश देते हैं। सचमुच, यह मंगलभाव से भरा प्रेरणादायक गीत है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
