यह भजन “स्वामीजी! थांरी साधना री” आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित है। इसमें स्वामीजी की ऊँची साधना, गहरी तपस्या और महान व्यक्तित्व का सुंदर वर्णन किया गया है। गीत में उनके त्याग, संयम, अनुशासन और सत्य के प्रति अटूट निष्ठा को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। यह रचना हमें धर्ममार्ग पर चलने, धैर्य रखने और आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
स्वामीजी! थांरी साधना री
🎶 लय – मारूजी! थांरै देश में
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी
स्वामीजी! थांरी साधना री मेरू-सी ऊंचाई,
मेरू-सी ऊंचाई, है सागर-सी गहराई हो।।
सिंह-सपन स्यूं आया माता,
दीपां रै प्रांगण में,
सिंह-वृत्ति स्यूं ही उतरया,
संयम रै समरांगण में,
मरुधर रा धोरी वीर जी,
चाल्या बाधावां चीर जी,
कान खड़या होग्या दुनियां रा,
बाजी जद शहनाई हो।।
तन नै साध्यो मन नै साध्यो,
और साध्य नै साध्यो,
तपतै सूरज रो आतप लेतां,
ओ हीरो लाध्यो,
सरिता-चर सुख री सेज जी,
प्रकट्यो अन्तर रो तेज जी,
गण री जड़ में खून पसीनै,
री है खरी कमाई हो।।
सूझबूझ रा धणी सांतरा,
सत्य धर्म रा खोजी,
आज्ञा अनुशासन रा हामी,
वीर प्रभू रा फोजी,
ननु-नच रो है के काम जी,
चाहे सुबै हुवो या शाम जी,
सिद्धान्तां रे खातिर करता,
बाबै स्यूं भी डाई हो।।
लाभ-अलाभ प्रशंसा-निन्दा,
सुख-दु:ख नै सम मान्यो,
मुखड़ै पर मुसकान अजब,
आज्ञानी मुक्को ताण्यो,
आता रहता तूफान जी,
छोड़यो कद अनुसंधान जी,
हिम्मत री कीमत चिन्ता री,
पड़ी नहीं परछाई हो।।
अन्तरंग बहिरंग घणी,
रोमांचक है घटनावां,
एक-एक स्यूं बढ़कर,
किसी-किसी कहकर बतलावां?
जुग-जुग रहसी इतिहास जी,
भरसी मन में उल्लास जी,
इं कलियुग में आ सतयुग-री,
झांकी-सी दिखलाई हो।।
स्वर्ण कसौटी पर निखरै,
आ केबत बोत पुराणी,
जीवन स्यूं प्रत्यक्ष दिखाई,
श्वेत-संघ-सेनानी,
जाग्यो अन्तर विश्वास जी,
टूट्या भक्तां रा पाश जी,
धीरै-धीरै अपणी गति स्यूं,
प्रगट हुई सच्चाई हो।।
वीतराग रै वचनां पर ही,
जीवन सारो वारयो,
रात-रात भर जाग-जाग,
कइयां रो भार उतारयो,
बै अंकुर बण्या महान जी,
फळवान हुयो उद्यान जी,
गंगाशहर भिक्षु-चरमोत्सव,
‘तुलसी’ गरिमा गाई हो।।
यह भजन स्वामीजी के महान जीवन, तप और त्याग की प्रेरक गाथा है। इसे पढ़कर और गाकर हमारे मन में श्रद्धा, साहस और धर्म के प्रति विश्वास बढ़ता है। यह रचना सदैव प्रेरणा देती रहेगी।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
