रूं-रूं में सांवरियो बसियो (Ru-Ru Mein Sanwariyo Basiyo)

यह भक्ति-गीत “रूं-रूं में सांवरियो बसियो” जैन संत परंपरा की गहरी श्रद्धा और गुरु-भक्ति को व्यक्त करता है। इसके रचयिता आचार्य श्री तुलसी हैं। इस गीत में शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम, समर्पण और आंतरिक भावनाएँ बहुत सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रकट हुई हैं। हर पंक्ति में गुरु को जीवन का आधार बताया गया है।

 

रूं-रूं में सांवरियो बसियो

🎶 लय – बादलियो आंखड़ल्यां में

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी

 

रूं-रूं में सांवरियो बसियो, 

सांवरियो बसियो,

चंद चकोर निहारेला, ओ भंते!

 

गुरु-चरणां रो बणग्यो रसियो, 

बणग्यो रसियो,

मांझी पार उतारेला, ओ भंते!

 

आप पिता, पुत्र मैं हूं, ओ तो व्यवहार है,

आखिर आपां दोन्यां नै ही, गुरु रो आधार है,

गुरु ही कारज सारेला, ओ भंते!

 

निश्‍चै में गुरुदेव ही मां-बाप, आप मानल्यो,

म्हारी अन्तर-आत्मा री, भावना पिछाणल्यो,

मिथ्या आग्रह हारेला, ओ भंते!

 

बोल सुण्यां किसनोजी रो, पारो पूरो चढ़ग्यो,

रोष और सांस रो, अपार वेग बढ़ग्यो,

विग्रह काम बिगाड़ैला, ओ भंते!

 

स्वामीजी भी छोड़ै मनै, तू भी छोड़ देवैला,

सोच जरा पछै म्हारै, साथै कुण रेवैला,

आभो आंख उघाड़ेला, ओ भंते!

 

म्हारै सागै रे’णो पड़सी, नहीं कोई चारो है,

बुढ़ापै में थारै बिना, और कुण स्हारो है,

म्हारो हृदय विदारेला, ओ भंते!

 

थांरो ल्यायो आ’ र म्हारै, खाणै रा ही त्याग है,

मोह-ममता छोड़ धारयो, पूरण वैराग है,

सत्याग्रह उद्धारेला, ओ भंते!

 

दोय दिन बीत्या, नहीं खायो और पीयो है,

अंधेरै में जाणै कोई, चास दियो दीयो है,

तीजो दिन ललकारेला, ओ भंते!

 

ओ है थांरो भक्त, इं रा थे ही भगवान हो,

आण सूंप्यो स्वामीजी नै, समो बो महान हो,

श्रद्धा सदा उबारेला, ओ भंते!

 

उठी है आवाज पड़सी, सारां नै गुण गावणां,

भीखणजी री बुद्धि देखो, तीनां घरां बधावणां,

‘तुलसी’ तरै रु तारेला, ओ भंते!

 

यह भजन गुरु-भक्ति, समर्पण और सच्चे वैराग्य का सुंदर संदेश देता है। इसमें शिष्य का प्रेम और श्रद्धा साफ झलकती है। अंत में यही भाव है कि गुरु ही जीवन के सच्चे मार्गदर्शक और उद्धारक हैं।

🙏 जय जिनेंद्र 🙏