यह भजन “भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी” आचार्य श्री भिक्षु स्वामी की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। इसमें उनके प्रकट होने, उनके दिव्य गुणों और उनके द्वारा स्थापित दृढ़ मर्यादाओं का स्मरण किया गया है। भजन श्रद्धा, भक्ति और कृतज्ञता से भरा हुआ है। सरल शब्दों में रचित यह पद भक्तों के हृदय में आचार्य श्री के प्रति आदर और प्रेरणा जगाता है तथा उनके उपकारों को याद दिलाता है।
भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी
🎶 लय – लिछमण म्हारे आया जी रमके
✍🏻 रचयिता – श्री मज्जयाचार्य जी
भिक्षु म्हारै प्रगट्या जी भरत खेतर में।
ज्यांरो ध्यान धरूं अंतर में।।
देश-देश नां लोक आपनों,
समरण कर रह्या उर में।।
आप तणी बुध नीं परशंसा,
बहु लोक करै पुर-पुर में।।
मंत्राक्षर-सम नाम तुम्हारो,
विघ्न मिटै घर-घर में।।
जबर उद्योत कियो जशधारी,
एह पंचमें अर में।।
आप तणां गण में स्थिर पद सूं,
वसियै वास अमर में।।
आप तणां गण थी ‘उपराठा’,
उभय भवे दु:ख भर में।।
सांप्रत काले स्वाम गण पायो,
आयो चिंतामणि कर में।।
आप आचारज महा उपगारी,
कल्पवृक्ष जिम ‘तर’ में।।
दृढ़ मर्याद बांधी आप वारु,
सतियां ने मुनिवर में।।
उगणीसै गुणतीस बैसाखे,
सुद छठ बीदासर में।।
भिक्षु भारीमाल ऋषिराय प्रसादे,
‘जयजश’ सुख-मंदर में।।
यह भजन हमें आचार्य श्री भिक्षु स्वामी के महान जीवन और उपकारों को याद करने की प्रेरणा देता है। उनके बताए मार्ग पर चलकर हम अपने जीवन को श्रेष्ठ, संयमित और धर्ममय बना सकते हैं।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
