प्रभो! तुम्हारे पावन पथ पर (Prabho! Tumhare Pavan Path Par)

यह रचना आस्था, संकल्प और आत्मशुद्धि की प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है। इसमें जीवन को प्रभु के पावन मार्ग पर अर्पित करने, सत्य और सिद्धांतों पर अडिग रहने तथा संघर्षों से निखरने का भाव है। यह रचना व्यक्ति को निर्भीक होकर आगे बढ़ने, रूढ़ियों को तोड़ने और शुद्ध आचरण व विचारों के साथ नवीन निर्माण की प्रेरणा देती है।

 

प्रभो! तुम्हारे पावन पथ पर

🎶 लय – वृंदावन का कृष्ण 

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

प्रभो! तुम्हारे पावन पथ पर, 

जीवन अर्पण है सारा।

बढ़े चलें, हम रुके न क्षण भी, 

हो यह दृढ़ संकल्प हमारा।।

 

प्राणों की परवाह नहीं है, 

प्रण को अटल निभाएंगे,

नहीं अपेक्षा है औरों से, 

स्वयं लक्ष्य को पाएंगे।

एक तुम्हारे ही वचनों का, 

भगवन्‌! प्रतिपल सबल सहारा।।

 

ज्यों-ज्यों चरण बढ़ेंगे आगे, 

स्वत: मार्ग बन जाएगा,

हटना होगा उसे बीच से, 

जो बाधक बन आएगा।

रुक न सकेगी, मुड़ न सकेगी, 

सत्य क्रान्ति की उज्ज्वल धारा।। 

 

आत्मशुद्धि का जहाँ प्रश्‍न है, 

सम्प्रदाय का मोह न हो,

चाह न यश की और किसी से,

भी कोई विद्रोह न हो।

स्वर्ण विघर्षण से ज्यों सत्य, 

निखरता संघर्षों के द्वारा।। 

 

आग्रह-हीन गहन चिन्तन का, 

द्वार हमेशा खुला रहे,

कण-कण में आदर्श तुम्हारा, 

पय-मिश्री ज्यों घुला रहे।

जागे स्वयं जगाएं जग को, 

हो यह सफल हमारा नारा।।

 

नया मोड़ हो उसी दिशा में, 

नयी चेतना फिर जागे,

तोड़ गिराएं जीर्ण-शीर्ण, 

जो अन्धरूढ़ियों के धागे।

आगे बढ़ने का यह युग है, 

बढ़ना हमको सबसे प्यारा।।

 

शुद्धाचार विचार-भित्ति पर, 

हम अभिनव निर्माण करें,

सिद्धांतों को अटल निभाते, 

निज पर का कल्याण करें।

इसी भावना से भिक्षु का, 

‘तुलसी’ चमका भाग्य-सितारा।।

 

यह रचना हमें सत्य, साहस और आत्मशुद्धि के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। प्रभु के वचनों को आधार बनाकर जीवन को सार्थक करने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प जगाता है।

🙏 जय जिनेंद्र 🙏