देवो देवो जी डगर वर (Devo Devo ji Dagar Var)

“देवो देवो जी डगर वर” एक भावपूर्ण जैन स्तवन है, जिसकी रचना आचार्य श्री तुलसी ने की है। इस स्तवन में भक्त सिद्ध-नगर की ओर जाने वाले मार्ग का रहस्य जानने की प्रार्थना करता है और परमात्मा के सिद्ध पद को प्राप्त करने की भावना व्यक्त करता है। गीत में आत्मा के शुद्ध, अक्षय और आनंदस्वरूप होने का चिंतन है तथा प्रभु से कृपा और मार्गदर्शन की विनम्र याचना की गई है।

 

देवो देवो जी डगर वर

🎶 लय – आए आए जी बदरवा  

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

देवो देवो जी डगर वर,

सिद्धि नगर चढ़ ज्यावूं।

थांरो पलक-पलक,

मैं अपलक ध्यान लगावूं।।

 

किण मारग स्यूं श्रीजिनवरजी!

अपणै धाम सिधावो?

समदर्शी सर्वज्ञ परम-प्रभु,

परमातम पद पावो।

दरसावो, मैं भी तिण पथ

निजर टिकाऊं।।

 

अक्षय अरुज अनंत अचल

अज अव्याबाध कहावो,

क्यूं कर सहजानंद-समन्दर में

विलीन हो ज्यावो?

बतलावो, मैं भी बो ही

क्रम अपणावूं।।

 

निकट अनंत अलोक पड़यो,

क्यूं लोकांते थिति ठावो?

पैंतालीस लाख जोजन में,

सारा किंयां समावो?

समझावो, मैं स्वयमेव

समझणो चावूं।।

 

एकर भी क्षण-भर भी साहिब!

साक्षात्कार करावो,

तो मन चाह्या फळै मनोरथ,

लाग्यो हृदय उम्हावो।

उमगावो, पर नहिं मन

घबराट मचाऊं।।

 

अनुपमेय आज्ञेय सच्चिदानन्द

दया दिखलावो,

साद्यनंत भगवंत हंत!

भगतां नै क्यूं तरसावो?

सरसावो, ‘तुलसी’ सिद्ध

स्तवन सुणाऊं।।

 

यह स्तवन हमें प्रभु-भक्ति, आत्मचिंतन और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देता है। आचार्य श्री तुलसी की वाणी साधक को श्रद्धा, विवेक और धैर्य के साथ सिद्ध पद की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाती है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏