पाँचू परमेष्ठी प्यारा (Panchu Parmeshthi Pyara)

यह सुप्रसिद्ध जैन भजन आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित है, जो ‘जैन शासन’ के पंच परमेष्ठी (अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधू) को समर्पित है। ‘मैं ढूँढ फिरी जग सारा’ की सुमधुर लय पर आधारित यह रचना सरल राजस्थानी मिश्रित हिंदी में इन पांचों सर्वोच्च पदों की महिमा गाती है। इसमें भक्त अपने आराध्य के गुणों का वर्णन करते हुए उन्हें अपना सर्वस्व और असहायों का सहारा बताता है। यह भजन आत्मिक शांति और भक्ति भाव जगाने वाला एक उत्कृष्ट आध्यात्मिक गीत है।

 

पाँचू परमेष्ठी प्यारा

🎶 लय – मैं ढूँढ फिरी जग सारा 

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

जीवन धन सब कुछ म्हारा, 

पाँचू परमेष्ठी प्यारा।

है असहायां रा सहारा, 

पाँचू परमेष्ठी प्यारा।।

 

सर्वोच्च अर्हता धारी, 

अरहंत अमल अविकारी।

तीर्थंकर त्रिभुवन तारी, 

प्रवही प्रवचन री धारा।।

 

है सिद्ध सिद्धपद-वासी, 

अज अजरामर अविनाशी।

परमात्मा परम प्रकाशी, 

काटी करमां री कारा।।

 

धरमाचारज धृतिधारी, 

निष्कारण पर-उपकारी।

लाखां री नैय्या तारी, 

भगवान कहूँ भगतां रा।।

 

है उपाध्याय अविकारी, 

गणिपिटका रा भंडारी।

श्रुतदाता संकट-हारी, 

जिनशासन-गगन-सितारा।।

 

मुनिवर जग-ममता त्यागी, 

समता री प्रतिमा सागी।

है पाप-भीरु वैरागी, 

‘तुलसी’ मनमोहनगारा।।

 

यह मंगलकारी रचना हमें पंच परमेष्ठी के गुणों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती है। आचार्य तुलसी की यह कृति श्रद्धा और समर्पण का संगम है, जो आत्मा को बुराइयों से हटाकर परमात्मा के मार्ग पर चलने का संदेश देती है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏