श्रद्धा विनय समेत, नमो अरहंताणं (Shraddha Vinay Samet, Namo Arhantanam)

यह भक्ति रचना आचार्य श्री तुलसी द्वारा रचित एक पावन वंदना है, जो जैन धर्म के सर्वोपरि ‘णमोकार महामंत्र’ पर आधारित है। इसमें पंच परमेष्ठी (अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु) के विशिष्ट गुणों का अत्यंत सरल और भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह स्तुति हमें सिखाती है कि श्रद्धा और विनम्रता के साथ महापुरुषों का स्मरण करने से चित्त में निर्मलता आती है। आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने और आत्म-कल्याण की भावना रखने वाले जिज्ञासुओं के लिए यह एक प्रेरणादायी पाठ है।

 

श्रद्धा विनय समेत, नमो अरहंताणं

🎶 लय – धर्म की जय हो 

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री तुलसी 

 

श्रद्धा विनय समेत, नमो अरहंताणं।

प्रांजल प्रणत सचेत, नमो अरहंताणं।।

 

आध्यात्मिक पथ के अधिनेता,

वीतराग प्रभु विश्‍व-विजेता।

शरच्चंद्र सम श्‍वेत, नमो अरहंताणं।।

 

अक्षय अरुज अनन्त अचल जो,

अटल अरूप स्वरूप अमल जो।

अजरामर अद्वैत, नमो श्री सिद्धाणं।।

 

धर्म-संघ के जो संवाहक,

निर्मल धर्म-नीति-निर्वाहक।

शासन में समवेत, नमो आयरियाणं।।

 

आगम अध्यापन में अधिकृत,

विमल कमल-सम जीवन अविकृत।

शम संयम समुपेत, नमो उवज्झायाणं।।

 

आत्म-साधना-लीन अनवरत,

विषय वासनाओं से उपरत।

‘तुलसी’ है अनिकेत, नमो लोए सव्‍वसाहूणं।।

 

आचार्य तुलसी की यह कृति हमें बाह्य आडंबरों से दूर आंतरिक शुद्धि और संयम का मार्ग दिखाती है। पंच परमेष्ठी के गुणों का यह गान साधक के भीतर विनय और वैराग्य जगाकर उसे आत्म-साधना की ओर अग्रसर करता है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏