श्वेतांबर तेरापंथ के जयकारे (Shwetambar Terapanth Ke Jaikaare)

श्वेतांबर तेरापंथ जैन धर्म की एक प्रमुख परंपरा है। इसकी स्थापना आचार्य भिक्षु ने 1760 में की थी। तेरापंथ अनुशासन, आचार-संहिता और एक आचार्य की परंपरा पर आधारित है। इसमें साधु-साध्वियाँ कठोर नियमों का पालन करते हैं। तेरापंथ में अहिंसा, संयम और साधना को विशेष महत्व दिया जाता है। समाज सेवा, नैतिक जीवन और आत्मशुद्धि इसके मुख्य उद्देश्य हैं।

 

श्वेतांबर तेरापंथ के जयकारे

श्रमण भगवान महावीर स्वामी की,

जय हो।  

क्रांतिकारी वीर भिक्षु की

जय हो। 

गणाधिपति पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी की

जय हो। 

प्रेक्षा प्रणेता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की

जय हो। 

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की

जय हो। 

साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी की

जय हो। 

जैन धर्म की

जय हो। 

मानव धर्म की

जय हो। 

अहिंसा धर्म की

जय हो। 



भगवान महावीर ने क्या बताया,

समता धर्म – समता धर्म।  

विशाला नंदन वीर की,

जय बोलो महावीर की।

तेरापंथ की क्या पहचान,

एक गुरु और एक विधान।

निज पर शासन,

फिर अनुशासन।

नैतिकता की पुनः प्रतिष्ठा,

हम लोगों को करनी है।

संयम खलु जीवनम्,

संयम ही जीवन है।

नया सवेरा आये,

सोया मन जग जाये।

कैसे बदले जीवन धारा,

अणुव्रतों के द्वारा।

हिंसा के इस गहन तिमिर में, 

अणुव्रत एक सहारा है।

कैसे बदले जीवन-धारा,

प्रेक्षा ध्यान साधना द्वारा।

दोनों हाथ,

एक साथ।

आओ मिलकर करें प्रयोग,

सहज मिले सबका सहयोग।

तपस्या करने वाले,

धन्य हो – धन्य हो – धन्य हो।

 

श्वेतांबर तेरापंथ अपने अनुशासन और संगठन के लिए प्रसिद्ध है। इसमें पूरे संघ का संचालन एक ही आचार्य द्वारा किया जाता है। तेरापंथ में साधु-साध्वियाँ पैदल विहार करते हैं और एक स्थान पर स्थायी निवास नहीं करते। हर वर्ष मर्यादा महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें संघ के नियमों की समीक्षा होती है। तेरापंथ में शिक्षा, महिला संगठन और युवाओं की सक्रिय भागीदारी भी विशेष रूप से देखी जाती है।  

🙏 जय जिनेंद्र 🙏